Health Tips: त्वचा पर अचानक जलन, चुभन, दर्द और छोटे-छोटे दाने या फफोले निकलना कई बार सामान्य स्किन प्रॉब्लम लग सकता है। लेकिन अगर इन लक्षणों की वजह शिंगल्स (Shingles) यानी हर्पीज जोस्टर है, तो इसे सिर्फ त्वचा से जुड़ी बीमारी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। शिंगल्स के बाद होने वाली कुछ जटिलताओं को लेकर मेडिकल रिसर्च में स्ट्रोक और कुछ कार्डियोवैस्कुलर घटनाओं के बढ़े हुए जोखिम के बीच संबंध देखा गया है। खासकर संक्रमण के बाद शुरुआती समय को महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में जानिए शिंगल्स क्या है, इसके लक्षण कैसे पहचानें और इससे जुड़ी किन समस्याओं को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है।
शिंगल्स उसी वायरस के दोबारा सक्रिय होने से होता है, जो चिकनपॉक्स का कारण बनता है। इस वायरस को वैरिसेला-जोस्टर वायरस (Varicella-Zoster Virus) कहा जाता है। चिकनपॉक्स से ठीक होने के बाद वायरस शरीर से पूरी तरह खत्म नहीं होता। यह नसों के आसपास निष्क्रिय अवस्था में रह सकता है। उम्र बढ़ने या इम्यून सिस्टम कमजोर होने जैसी स्थितियों में यह वायरस दोबारा सक्रिय हो सकता है और शिंगल्स का कारण बन सकता है। आमतौर पर शिंगल्स में पहले प्रभावित हिस्से में दर्द, जलन, खुजली या झुनझुनी महसूस हो सकती है। इसके बाद छोटे-छोटे दाने और फफोले दिखाई देने लगते हैं। ये अक्सर शरीर या चेहरे के केवल एक हिस्से में, नसों के रास्ते के आसपास नजर आते हैं। समय के साथ फफोले सूखकर पपड़ी में बदल जाते हैं और कई मामलों में करीब 2 से 4 सप्ताह में ठीक हो जाते हैं।
दाने ठीक होने के बाद भी बना रह सकता है दर्द
शिंगल्स की एक प्रमुख जटिलता पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया (Postherpetic Neuralgia) है। इसमें त्वचा के दाने और फफोले ठीक होने के बाद भी नसों से जुड़ा दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है। कुछ लोगों में यह दर्द कई महीनों तक रह सकता है और दुर्लभ मामलों में इससे भी ज्यादा समय तक परेशानी बनी रह सकती है। उम्र बढ़ने के साथ इस जटिलता का जोखिम बढ़ता है। अगर शिंगल्स चेहरे या आंख के आसपास हुआ है, तो मामला ज्यादा गंभीर हो सकता है। ऐसे मामलों में आंखों और नजर पर असर पड़ने का खतरा रहता है। बहुत दुर्लभ मामलों में संक्रमण मस्तिष्क में सूजन जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या का कारण भी बन सकता है।
शिंगल्स और स्ट्रोक का क्या संबंध है ?
मेडिकल रिसर्च में शिंगल्स के बाद स्ट्रोक के जोखिम में बढ़ोतरी के बीच संबंध देखा गया है। यह जोखिम संक्रमण के बाद शुरुआती अवधि में ज्यादा दिखाई दे सकता है। इसके पीछे संभावित कारणों में वायरस से जुड़ी रक्त-नलिकाओं में सूजन और वैस्कुलोपैथी जैसी प्रक्रियाएं शामिल मानी जाती हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि शिंगल्स होने वाले हर व्यक्ति को स्ट्रोक जरूर होगा। इसी तरह कुछ अध्ययनों में शिंगल्स और हार्ट अटैक तथा अन्य कार्डियोवैस्कुलर घटनाओं के बीच भी संबंध पाया गया है। इसलिए खासकर उम्रदराज लोगों और पहले से हृदय संबंधी जोखिम वाले लोगों में लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
शिंगल्स होने पर कब डॉक्टर से संपर्क करें ?
अगर शरीर के किसी एक हिस्से में अचानक जलन, चुभन या तेज दर्द के साथ छोटे-छोटे फफोले निकलने लगें, तो जल्द डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। खासकर इन स्थितियों में तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें:
- चेहरे या आंख के आसपास फफोले निकलना
- बहुत तेज या लगातार दर्द होना
- तेज सिरदर्द, कमजोरी या बोलने में परेशानी जैसे न्यूरोलॉजिकल लक्षण
- इम्यून सिस्टम कमजोर होना
- उम्र अधिक होना
- दाने तेजी से शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलना
शिंगल्स का इलाज जितनी जल्दी शुरू किया जाए, उतना बेहतर माना जाता है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार एंटीवायरल दवाएं और दर्द नियंत्रित करने वाली दवाएं दे सकते हैं।
शिंगल्स से बचाव कैसे करें ?
शिंगल्स से बचाव के लिए वैक्सीन एक महत्वपूर्ण विकल्प है। टीकाकरण से शिंगल्स और इससे होने वाली कुछ जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। वैक्सीन किस उम्र और किन लोगों के लिए उपयुक्त है, यह व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर से तय किया जाना चाहिए। अगर घर में किसी व्यक्ति को शिंगल्स है, तो उसके फफोलों को सीधे छूने से बचें। प्रभावित हिस्से को साफ और ढककर रखना भी जरूरी है। ध्यान रखें कि शिंगल्स वाले व्यक्ति से किसी ऐसे व्यक्ति को वायरस फैल सकता है, जिसे पहले चिकनपॉक्स नहीं हुआ है या जिसका टीकाकरण नहीं हुआ है। ऐसे व्यक्ति में संक्रमण शिंगल्स के बजाय चिकनपॉक्स के रूप में हो सकता है।


