Sarva Pitru Amavasya 2026: पितृपक्ष का आखिरी दिन सर्वपितृ अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। इसे पितृ विसर्जन अमावस्या, बड़मावस और दर्श अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पूर्वज धरती लोक पर आते हैं और सर्वपितृ अमावस्या के दिन अपने लोक लौटते हैं। यही वजह है कि इस दिन पितरों की विदाई के साथ उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या उन लोगों के लिए भी विशेष मानी जाती है, जिन्हें अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती। ऐसी स्थिति में इस दिन श्राद्ध किया जा सकता है। इसके अलावा पितृपक्ष में किसी कारण से छूट गए श्राद्ध कर्म को भी इस दिन पूरा करने की मान्यता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है।
2026 में सर्वपितृ अमावस्या कब है ?
पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर 2026 की रात 9:35 बजे शुरू होगी और 10 अक्टूबर 2026 की रात 9:19 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर सर्वपितृ अमावस्या का पर्व 10 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है।
कैसे करें श्राद्ध और तर्पण ?
सर्वपितृ अमावस्या के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद घर में सात्विक भोजन तैयार करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है। पिंड बनाने के लिए चावल, तिल और जौ के आटे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करें। धार्मिक परंपरा में कौवे, गाय, कुत्ते और चींटियों के लिए भोजन निकालने की भी मान्यता है। अंत में ब्राह्मण को भोजन कराकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा दी जाती है।
शाम को करें दीपदान
सर्वपितृ अमावस्या की शाम भी विशेष मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूर्यास्त के बाद घर की छत या दक्षिण दिशा में पितरों के निमित्त दीपक जलाया जाता है। घर के पूजा स्थल पर घी का दीपक भी जलाया जा सकता है। इसके अलावा पीपल के पेड़ में जल अर्पित कर दीपक जलाने की परंपरा है। मछलियों को आटे की गोलियां और चींटियों को आटा या शक्कर खिलाने की भी धार्मिक मान्यता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, पितरों की मानसी कन्या अक्षोदा ने घोर तपस्या की थी।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर पितृ उनके सामने प्रकट हुए। इसी दौरान अक्षोदा पितृ अमावसु के रूप से प्रभावित हो गईं और उन्होंने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। अमावसु ने धर्म और मर्यादा का पालन करते हुए उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इससे अन्य पितृ नाराज हुए और अक्षोदा को पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दिया। वहीं, अमावसु के संयम और धर्मपालन से पितृ प्रसन्न हुए। मान्यता है कि इसी प्रसंग के कारण अमावसु के नाम से अमावस्या का नामकरण हुआ और इस दिन किए गए श्राद्ध को विशेष फलदायी माना गया।


