नई दिल्ली 28 जुलाई 2026। देशभर में पेपर लीक को लेकर उठे सियासी तूफान और छात्रों के अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन के बाद अब संसद में इस मुद्दे पर सबसे अहम लड़ाई शुरू होने जा रही है। आज मंगलवार को लोकसभा में ‘पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल, 2026’ पर चर्चा होगी। सरकार इसे परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और सख्त जवाबदेही की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, जबकि विपक्ष कानून को और प्रभावी बनाने के लिए 93 संशोधनों के साथ सदन में उतरने की तैयारी में है।
सोमवार को मानसून सत्र का दूसरा सप्ताह भी भारी हंगामे की भेंट चढ़ गया। छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की मांग को लेकर विपक्ष के विरोध के बीच लोकसभा की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। हालांकि इस राजनीतिक शोर-शराबे के बीच सरकार ने एंटी-पेपर लीक बिल सदन में पेश कर दिया, जिससे साफ हो गया कि अब परीक्षा प्रणाली में सुधार को लेकर संसद में सीधी बहस होगी। सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष के हस्तक्षेप के बाद सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध काफी हद तक खत्म हो गया है। ऐसे में मंगलवार को इस विधेयक पर करीब छह घंटे तक विस्तृत चर्चा होने की संभावना है।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित विपक्ष के कई वरिष्ठ नेता इस पर अपनी बात रख सकते हैं। प्रस्तावित संशोधन के तहत हर राज्य में पेपर लीक मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने और दो महीने के भीतर जांच पूरी करने का प्रावधान किया गया है। साथ ही पेपर लीक या परीक्षा में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के लिए कम से कम पांच वर्ष और अधिकतम दस वर्ष की जेल, तथा 50 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रस्ताव है। यदि अपराध संगठित गिरोह के माध्यम से किया जाता है, तो सात से दस वर्ष की सजा और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
सरकार का दावा है कि यह कानून लाखों छात्रों के भविष्य की सुरक्षा करेगा और वर्षों से परीक्षा प्रणाली पर लग रहे सवालों का जवाब बनेगा। वहीं विपक्ष का कहना है कि केवल सख्त सजा पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था भी बननी चाहिए जिससे भविष्य में पेपर लीक की घटनाओं पर पूरी तरह रोक लग सके। दिलचस्प बात यह है कि पेपर लीक का मुद्दा अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह संसद के भीतर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। ऐसे में मंगलवार की बहस सिर्फ एक कानून पर चर्चा नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि देश की परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने की दिशा में राजनीति और सरकार कितनी गंभीर है।

