रायपुर 3 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव के साथ-साथ अब जनप्रतिनिधियों और नौकरशाही के रिश्ते भी सवालों के घेरे में हैं। पिछले कुछ दिनों में सामने आए दो घटनाक्रमों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। एक ओर रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के बीच कथित फोन वार्ता का विवाद लोकसभा तक पहुंच गया है, वहीं दूसरी ओर कोरबा में पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल का आबकारी अधिकारी से कथित तौर पर तीखे लहजे में बात करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। दोनों मामलों के तथ्य अलग-अलग हैं, लेकिन ये घटनाएं प्रदेश में राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र के बीच बढ़ती दूरी का संकेत भी मानी जा रही हैं।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और स्वास्थ्य सचिव के बीच शुरू हुए विवाद ने सभी का ध्यान अपनी ओर खाींचा है। रायपुर में भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया पर फोन पर कथित तौर पर अभद्र व्यवहार करने और “जो करना है कर लो” जैसी टिप्पणी करने का गंभीर आरोप लगाया है। इस मामले को सांसद ने विशेषाधिकार हनन बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत की है। लोकसभा सचिवालय ने भी कार्मिक मंत्रालय से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है। दूसरी ओर कोरबा में शराब दुकान के विरोध के दौरान पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल का एक वीडियो सामने आया, जिसमें वे आबकारी विभाग के एक अधिकारी से मोबाइल फोन पर नाराजगी जाहिर करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो वायरल होने के बाद इस पर भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
क्या हैं राजनीतिक मायने ?
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो ये घटनाएं केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं हैं। इनके कई राजनीतिक मायने भी निकलते हैं। पहला…विपक्ष लगातार यह मुद्दा उठाने की कोशिश कर रहा है कि प्रदेश में नौकरशाही का प्रभाव बढ़ रहा है और जनप्रतिनिधियों की बातों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जा रहा। यही वजह है कि सांसद बृजमोहन अग्रवाल के मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी सार्वजनिक रूप से उनके पक्ष में बयान दिया। दूसरा…सरकार के सामने यह चुनौती भी है कि वह यह संदेश दे कि प्रशासनिक व्यवस्था जवाबदेह होने के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों के प्रति भी संवेदनशील है।
यदि इस तरह के विवाद लगातार सार्वजनिक होते हैं, तो विपक्ष इसे “अफसरशाही बनाम जनप्रतिनिधि” के राजनीतिक नैरेटिव में बदलने का प्रयास कर सकता है। वहीं दूसरी तरफ कोरबा की घटना यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या जनप्रतिनिधियों द्वारा अधिकारियों के साथ सार्वजनिक रूप से आक्रामक भाषा का इस्तेमाल प्रशासनिक व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव बनाने की छवि पैदा करता है ? लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को सवाल पूछने और विरोध दर्ज कराने का पूरा अधिकार है, लेकिन उससे जुड़ी संवैधानिक मर्यादाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
संवादहीनता क्यों बन रही है राजनीतिक मुद्दा ?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जब सरकार, जनप्रतिनिधि और नौकरशाही के बीच संवाद कमजोर पड़ने लगता है, तो उसका असर सीधे शासन व्यवस्था पर दिखाई देता है। ऐसे हालात में जनहित के मुद्दों से ज्यादा संस्थागत टकराव चर्चा का विषय बन जाते हैं।छत्तीसगढ़ में सामने आए हालिया घटनाक्रम भी इसी ओर इशारा करते हैं कि राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं, जबकि प्रशासनिक अधिकारी शासन व्यवस्था के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी निभाते हैं।
दोनों के अधिकार संविधान से तय होते हैं और दोनों की जवाबदेही भी जनता के प्रति होती है। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से अधिकारियों को चेतावनी देते नजर आएं या अधिकारी निर्वाचित प्रतिनिधियों से संवाद में मर्यादा खोते दिखें, तो इससे केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वास भी प्रभावित होता है। फिलहाल, रायपुर और कोरबा के दोनों मामले अपने-अपने स्तर पर अलग प्रक्रियाओं में हैं। लेकिन इतना तय है कि इन घटनाओं ने प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है कि…..क्या छत्तीसगढ़ में राजनीति और नौकरशाही के बीच संवाद कमजोर पड़ रहा है, और क्या यह आने वाले समय में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है?


