महासमुंद 27 जून 2026। जिस शिक्षक के हाथों में बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी होती है, जब वही भरोसे को तार-तार कर दे तो सवाल सिर्फ एक अपराध का नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की नैतिकता पर खड़े हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में नाबालिग छात्रा के साथ अशोभनीय हरकत और बैड टच के मामले में फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय ने आरोपी शिक्षक को पांच वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि आरोपी ने शिक्षक जैसे जिम्मेदार पद और गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते का गंभीर दुरुपयोग किया है।
अपर सत्र न्यायाधीश मोनिका जायसवाल की अदालत ने आरोपी गणेशराम चंद्राकर को पॉक्सो अधिनियम की धारा-10 के तहत दोषी करार देते हुए पांच वर्ष के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई। वहीं भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-74 के तहत भी तीन वर्ष के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये के जुर्माने की सजा दी गई। अदालत ने आदेश दिया कि दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। मामला 8 जनवरी 2025 का है। पीड़ित छात्रा ने महासमुंद थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि गणित की कक्षा के दौरान शिक्षक ने उसके साथ बैड टच किया।
शिकायत में यह भी आरोप था कि उस समय शिक्षक नशे की हालत में था। पुलिस ने तत्काल पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की और पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया। सुनवाई के दौरान प्रस्तुत गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया। फैसले में कहा गया कि शिक्षक समाज में विश्वास और सम्मान का प्रतीक होता है। विद्यार्थियों की सुरक्षा और संरक्षण उसकी पहली जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि वही अपने पद का दुरुपयोग कर छात्रा के साथ अशोभनीय व्यवहार करता है, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि समाज के विश्वास के साथ भी गंभीर विश्वासघात है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों में केवल कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। शिक्षकों के चरित्र सत्यापन, नियमित आचार-संहिता प्रशिक्षण, स्कूलों में प्रभावी शिकायत तंत्र और बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’ के प्रति लगातार जागरूक करना भी उतना ही जरूरी है। एक शिक्षक का सम्मान उसके ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके आचरण से तय होता है। महासमुंद का यह मामला बताता है कि शिक्षा के मंदिर में यदि नैतिकता कमजोर पड़ेगी, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों को होगा, जिनका भविष्य इन्हीं संस्थानों पर टिका है। अदालत का फैसला इस बात का स्पष्ट संदेश है कि बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों के लिए कानून में कोई नरमी नहीं होगी।

