दुर्ग 6 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ में जमीन पर काम भले ही थोड़ी देर से शुरू हो और आम जनता को राहत मिलने में वक्त लग जाए, लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को घेरने में जरा भी देर नहीं करते। जी हां, इन दिनों छत्तीसगढ़ की सियासत में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। जनता सड़क, पानी, स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है, वहीं बीजेपी और कांग्रेस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के वार करने में जुटे हैं। ताजा मामला दुर्ग में कांग्रेस के प्रशिक्षण शिविर पर बीजेपी के पोस्टर से जुड़ा है।। यहां शिक्षक दिवस पर शुरू हुए कांग्रेस के तीन दिवसीय ‘संगठन सृजन प्रशिक्षण शिविर’ के बीच बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्टर जारी किया, जिसमें उन्हें ‘घोटालों की क्लास’ के सामने दिखाया गया है। पोस्टर के साथ लिखा गया— “गुरु बिन ज्ञान कैसा… भूपेश बिन घोटाला कैसा…”
गुरु बिन ज्ञान कैसा..
भूपेश बिन घोटाला कैसा..शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं pic.twitter.com/lExKXAYaKS
— BJP Chhattisgarh (@BJP4CGState) September 5, 2026
गौरतलब है कि सियासत में तंज और आरोप नया नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि जब राजनीतिक दल एक-दूसरे को पोस्टरों के जरिए आईना दिखाने में व्यस्त हों, तब प्रदेश की जनता किसे अपना आईना माने ? खैर बीजेपी के पोस्टर पर कांग्रेस ने भी पलटवार किया। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के चेयरमैन दीपक बैज ने मीडिया में बयान देते हुए कहा कि….“बीजेपी के पास पोस्टर के अलावा बचा क्या है?” उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनता के पैसे से पोस्टर और मुख्यमंत्री का चेहरा चमकाने में लगी है। बैज ने सरकार के 1100 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होने का दावा करते हुए सवाल उठाया कि आखिर यह पैसा कहां खर्च हुआ ? दीपक बैज का यह दावा राजनीतिक आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। लेकिन बैज का सवाल उस बड़ी खाई की ओर जरूर इशारा करता है, जहां एक तरफ सरकारी प्रचार की चमक है और दूसरी तरफ जमीन पर बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझती जनता।
आप जैसा घोटाला मास्टर कोई नहीं, भूपेश!
घोटालों की ऐसी “शिक्षा” दी कि पूरी कांग्रेस आज भी आपसे सीख रही है… pic.twitter.com/EGbLISVsPN
— BJP Chhattisgarh (@BJP4CGState) September 5, 2026
छत्तीसगढ़ में विकास के दावों के बीच सड़कें आम आदमी के लिए सबसे सीधा पैमाना हैं। मौजूदा वक्त में राजधानी और बड़े शहरों से बाहर निकलते ही तस्वीर कई जगह बदल जाती है। ग्रामीण इलाकों में टूटी सड़कें, गड्ढों से भरे रास्ते और बरसात में कीचड़ से जूझते मार्ग लोगों के लिए रोजमर्रा की परेशानी बन जाते हैं। जिस सड़क पर एंबुलेंस को मरीज तक पहुंचने में मुश्किल हो, जिस रास्ते से गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना चुनौती हो, जिस मार्ग पर बच्चे स्कूल जाने के लिए मौसम से मुकाबला करें….वहां विकास का पोस्टर कितना भी बड़ा क्यों न हो, जमीन की सच्चाई उससे कहीं ज्यादा बड़ी होती है। और फिर यह समस्या सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है।
वनांचल में विकास की तस्वीर पोस्टर से अलग है
छत्तीसगढ़ के वनांचल और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बुनियादी सुविधाओं को लेकर लोगों की अपनी लड़ाई है। कहीं स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है, कहीं नियमित परिवहन की समस्या है, तो कहीं शिक्षा, पेयजल और बिजली जैसी सुविधाएं अभी भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। आदिवासी ग्रामीणों के लिए विकास का अर्थ किसी पोस्टर पर लिखे बड़े-बड़े शब्द नहीं, बल्कि गांव तक पहुंचने वाली पक्की सड़क, समय पर मिलने वाला इलाज, स्कूल तक सुरक्षित पहुंच, साफ पानी और रोजगार के अवसर हैं। उनके लिए सरकार का चेहरा किसी होर्डिंग पर नहीं, बल्कि उस अधिकारी, शिक्षक, डॉक्टर और सड़क निर्माण करने वाली मशीन में दिखाई देता है, जो वास्तव में उनके गांव तक पहुंचे।


