रायपुर 5 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी नक्सली हमले में जगदलपुर की विशेष NIA अदालत के फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति फिर गरमा गई है। अदालत ने मामले में सुनवाई का सामना कर रहे 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है। फैसले के तुरंत बाद कांग्रेस और बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने फैसले के बाद NIA की जांच पर गंभीर सवाल उठाए और इसे ‘लीपापोती’ बताया। वहीं, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष किरण देव ने बघेल के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि अदालत का फैसला NIA की जांच और न्यायपालिका की निष्पक्षता को दर्शाता है।
झीरम कांड में अदालत के फ़ैसले को देखकर लगता है कि यह अधूरा न्याय है.
पहली बात यह है कि झीरम घाटी में रचा गया षडयंत्र दुनिया के लोकतंत्र के इतिहास का सबसे बड़े राजनीतिक नरसंहार था और ऐसे मामले में निचले स्तर के सिर्फ़ 10 नक्सलियों को सज़ा मिलने को न्याय नहीं कहा जा सकता.
इस घटना…— Bhupesh Baghel (@bhupeshbaghel) September 5, 2026
पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि वह अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन झीरम मामले की जांच को लेकर उनके सवाल अब भी कायम हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि FIR में जिन बड़े नक्सली नेताओं के नाम सामने आए थे, जांच एजेंसी उन तक नहीं पहुंच सकी। बघेल ने यह भी सवाल उठाया कि झीरम हमले के पीछे कथित बड़ी साजिश की जांच क्यों नहीं हुई। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने मामले की जांच के लिए SIT का गठन किया था, लेकिन NIA ने SIT की जांच को अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दी। बघेल ने आरोप लगाया कि सरकार बदलने के बाद झीरम मामले की आगे की जांच प्रभावित हुई।
दीपक बैज ने कहा…..झीरम हमला राजनीतिक षड्यंत्र और सुपारी किलिंग थी
झीरम कांड में आये एनआईए के फैसले के बाद सूबे की राजनीति गरमा गयी है। इस विशेष कोर्ट के इस फैसले पर पीसीसी चीफ दीपक बैज ने कहा कि बस्तर जानता है कि कांग्रेस नेताओं और जवानों की हत्या राजनीतिक षड्यंत्र और सुपारी किलिंग थी। सत्ता हासिल करने के लिए हत्याएं कराई गई थीं। जिन 10 लोगों को आरोपी बनाया गया है, वे बड़े नक्सली नहीं थे। हमले की प्लानिंग करने वाले बड़े नक्सली लीडरों पर कार्रवाई नहीं हुई।
BJP का पलटवार- ‘अदालत के फैसले से NIA की जांच साबित’
बघेल के आरोपों पर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष किरण देव ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि अदालत का फैसला बताता है कि NIA ने मामले की जांच गंभीरता से की और न्यायपालिका ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया। किरण देव ने बघेल पर निशाना साधते हुए सवाल किया- “जेब में कौन-सी पर्ची लेकर घूमते थे?” बीजेपी का कहना है कि अदालत के फैसले के बाद जांच एजेंसी पर सवाल उठाना उचित नहीं है। वहीं कांग्रेस अब भी झीरम हमले की पूरी साजिश और जिम्मेदार लोगों तक जांच पहुंचने का सवाल उठा रही है।
101 गवाह, दस्तावेजी साक्ष्य और फिर फैसला
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने 101 गवाहों के बयान और दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए थे। 10 अगस्त को अंतिम बहस पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। 5 सितंबर को अदालत ने मामले में बचे सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया। इससे पहले कुल 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही थी, लेकिन एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। अदालत के फैसले के बाद आरोपियों के वकील अरविंद चौधरी ने कहा कि वे फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और इसे हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। एक दोषी करार दिए गए आरोपी के बेटे ने भी अपने पिता को मामले में फंसाए जाने का दावा किया है। यानी अदालत के फैसले के बाद अब कानूनी लड़ाई आगे भी जारी रहने की संभावना है।
25 मई 2013 को हुआ था झीरम हमला
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान सुकमा से जगदलपुर लौट रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं के काफिले पर झीरम घाटी में नक्सलियों ने हमला किया था। इस हमले में तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा समेत कांग्रेस के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौत हुई थी। कुल 29 लोगों की जान गई थी, जिनमें 10 पुलिसकर्मी भी शामिल थे। हमले में 38 लोग घायल हुए थे। झीरम मामले में अदालत का फैसला आने के बाद एक तरफ 10 आरोपियों को दोषी करार दिया गया है, तो दूसरी तरफ जांच की दिशा और कथित साजिश को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है। कांग्रेस का सवाल है कि क्या जांच केवल हमले को अंजाम देने वालों तक सीमित रही या इसके पीछे की पूरी साजिश तक पहुंची? वहीं बीजेपी अदालत के फैसले को NIA की जांच की मजबूती का प्रमाण बता रही है। अब दोषियों की ओर से हाईकोर्ट जाने की तैयारी और कांग्रेस-BJP के बीच जारी सियासी बयानबाजी के बीच झीरम मामला एक बार फिर छत्तीसगढ़ की राजनीति के केंद्र में आ गया है।


