रायपुर 9 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ में रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और स्वास्थ्य सचिव IAS अमित कटारिया के बीच चल रहा विवाद अब और तूल पकड़ता दिख रहा है। इस मामले में अब मध्यप्रदेश की पूर्व सांसद और पूर्व कैबिनेट मंत्री जयश्री बनर्जी ने भी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने मांग की है। इसके साथ ही उन्होने स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के कार्यकाल में हुए 108 एंबुलेंस सेवा के टेंडर का मुद्दा उठाते हुए जांच की मांग की है।
गौरतलब है कि बीजेपी के सीनियर लीडर और रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के बीच 20 मई 2026 को विवाद शुरू हुआ था। बृजमोहन अग्रवाल ने बताया था कि…जनहित से जुड़े उनके कई पत्रों और स्मरण पत्रों का लंबे समय से जवाब नहीं दिया जा रहा था। जिसे लेकर उन्होने मोबाइल पर स्वास्थ्य सचिव से इसकी जानकारी चाही गयी। लेकिन बातचीत के दौरान उचित जानकारी देने के बजाये आईएएस अफसर अमित कटारिया उल्टे सांसद से विवाद कर बैठे।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल का आरोप है कि…..स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया ने बातचीत के दौरान उनसे कथित तौर पर….‘जो करना है कर लो‘ कहा था। जिसके बाद सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने अधिकारी के इस व्यवहार को सांसद के विशेषाधिकार और जनप्रतिनिधियों के साथ निर्धारित प्रोटोकॉल से जोड़ते हुए इस पूरे घटनाक्रम की शिकायत लोकसभा अध्यक्ष से की थी। अब इस मामले को लेकर मध्यप्रदेश की पूर्व सांसद और पूर्व कैबिनेट मंत्री जयश्री बनर्जी ने भी लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने मांग की है।
जयश्री बनर्जी ने 5 अगस्त 2026 को भेजे पत्र में कहा है कि….उन्हें मीडिया रिपोर्टों के जरिए सांसद बृजमोहन अग्रवाल की ओर से अमित कटारिया के खिलाफ की गई शिकायत की जानकारी मिली। उन्होंने शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच और आरोप सही पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है। पूर्व सांसद ने अपने पत्र में स्वास्थ्य विभाग से जुड़े 108 एंबुलेंस सेवा के टेंडर का मुद्दा भी उठाया है। उन्होंने टेंडर प्रक्रिया में कथित नियमों की अनदेखी और अनियमितताओं के आरोपों की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि 108 एंबुलेंस सेवा सीधे आम लोगों की स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी है।
ऐसे में टेंडर प्रक्रिया में अगर किसी तरह की अनियमितता हुई है, तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। खैर छत्तीसगढ़ की इस घटना ने एक बार फिर जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच तालमेल और जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है। जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी जनता से जुड़े मुद्दों को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाने की है, जबकि ब्यूरोक्रेसी सरकारी नीतियों और योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी संभालती है।
दोनों के बीच संवाद और समन्वय लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। ऐसे में जब किसी सांसद और IAS अधिकारी के बीच विवाद सार्वजनिक हो जाता है, तो सवाल सिर्फ एक फोन कॉल या व्यक्तिगत मतभेद का नहीं रह जाता। सवाल यह भी उठता है कि जनप्रतिनिधियों की शिकायतों पर अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय हो और प्रशासनिक व्यवस्था में संवाद का रास्ता कितना प्रभावी है।


