बिलासपुर, 16 अगस्त 2026। नगर निगम बिलासपुर में कार्यरत कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने नगर निगम बिलासपुर के सक्षम प्राधिकारी को कर्मचारियों की ओर से प्रस्तुत अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार कर तीन महीने के भीतर तार्किक निर्णय लेने का निर्देश दिया है। कोर्ट का यह आदेश जागेश्वर दुबे और अन्य की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान आया।
याचिकाकर्ताओं में नगर निगम बिलासपुर में कार्यरत माली जागेश्वर दुबे, इलेक्ट्रीशियन चंद्र कुमार नागदौने, टाइम कीपर मिर्जा वाहिद बेग और माली पेट्रिक पास्टी शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि लंबे समय से सेवाएं देने के बावजूद उनका नियमितीकरण नहीं किया जा रहा है। याचिकाकर्ताओं ने नियमितीकरण से वंचित किए जाने को मनमाना बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत अपने अधिकारों का हवाला दिया था।
उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग के 5 मार्च 2008 के परिपत्र के आधार पर समान और उनसे कनिष्ठ कर्मचारियों की तरह नियमितीकरण का लाभ दिए जाने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि नियमितीकरण के संबंध में नगर निगम बिलासपुर के कमिश्नर के समक्ष पहले ही अभ्यावेदन प्रस्तुत किया जा चुका है। हालांकि, काफी समय बीतने के बाद भी उस अभ्यावेदन पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।
इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी मूल मांग को सीमित करते हुए हाईकोर्ट से केवल यह निर्देश देने का अनुरोध किया कि सक्षम प्राधिकारी उनके लंबित अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार कर फैसला लें। नगर निगम की ओर से पेश अधिवक्ता ने भी इस सीमित प्रार्थना का विरोध नहीं किया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने याचिका का निपटारा कर दिया। कोर्ट ने नगर निगम बिलासपुर के कमिश्नर को निर्देश दिया कि कर्मचारियों की ओर से प्रस्तुत अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार किया जाए और हाईकोर्ट के आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से तीन महीने के भीतर मामले में तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।
अतिरिक्त दस्तावेज देने की भी मिली छूट
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह स्वतंत्रता भी दी है कि वे अपने दावे के समर्थन में सभी प्रासंगिक दस्तावेजों के साथ सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अतिरिक्त अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उसने कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। ऐसे में अब सक्षम प्राधिकारी को संबंधित कर्मचारियों के अभ्यावेदन पर लागू नियमों, शासन के निर्देशों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना होगा।
हाईकोर्ट के आदेश से कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग पर तत्काल नियमितीकरण का आदेश नहीं हुआ है। कोर्ट ने केवल सक्षम प्राधिकारी को लंबित अभ्यावेदन पर नियमों के अनुसार विचार कर निर्धारित समयसीमा में निर्णय लेने का निर्देश दिया है। अब नगर निगम कमिश्नर के स्तर पर कर्मचारियों के दावे और संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद आगे का फैसला होगा।


