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    Home»शिक्षा»CG: शिक्षा मंत्री का फरमान…..”सरकारी स्कूलों के बच्चों को 25 तक पहाड़ा याद होना जरुरी”, बड़ा सवाल….आखिर शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधा के अभाव में कैसे बदलेगी तस्वीर ?
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    CG: शिक्षा मंत्री का फरमान…..”सरकारी स्कूलों के बच्चों को 25 तक पहाड़ा याद होना जरुरी”, बड़ा सवाल….आखिर शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधा के अभाव में कैसे बदलेगी तस्वीर ?

    DW HindiBy DW Hindi25/06/2026
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    रायपुर 25 जून 2026। छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को बारहखड़ी और 20 तक के पहाड़े, जबकि माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को 25 तक के पहाड़े याद कराने के निर्देश दिए हैं। साथ ही हिंदी और अंग्रेजी में फ्लूएंट रीडिंग सुनिश्चित करने की बात कही गई है। पहली नजर में यह फैसला शिक्षा की बुनियाद मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक कदम लगता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल पहाड़े और बारहखड़ी याद करा देने से सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियां दूर हो जाएंगी ?

    गौरतलब है कि आज भी प्रदेश के हजारों सरकारी स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। कहीं एक ही शिक्षक पूरे स्कूल का संचालन कर रहे है, तो कहीं विषय विशेषज्ञों के पद वर्षों से खाली पड़े हैं। अनेक स्कूलों में विज्ञान, गणित और अंग्रेजी के शिक्षक ही नहीं हैं। ऐसे में बच्चों से बेहतर शैक्षणिक प्रदर्शन की अपेक्षा करना कितना व्यावहारिक है, यह सरकार को भी सोचना होगा। स्थिति सिर्फ शिक्षकों की कमी तक सीमित नहीं है। प्रदेश के कई ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के स्कूल आज भी जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं। कहीं शौचालय नहीं हैं, तो कहीं पेयजल की व्यवस्था नहीं है।

    कई स्कूलों में बिजली, कम्पयूटर, फर्नीचर और खेल सामग्री जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। बरसात के दिनों में टपकती छतों और जलभराव के बीच पढ़ाई कर रहे बच्चों को पहाड़े याद कराने की चिंता जरूर होनी चाहिए, लेकिन उससे पहले उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है। सरकार ने 31 जुलाई तक ड्रॉपआउट बच्चों को दोबारा स्कूलों से जोड़ने का लक्ष्य रखा है। यह स्वागत योग्य पहल है, लेकिन सवाल यह है कि जिन कारणों से बच्चे स्कूल छोड़ने को मजबूर हुए, क्या उन कारणों को दूर करने की कोई ठोस रणनीति भी है ? केवल नामांकन बढ़ा देने से शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बढ़ेगी।

    स्कूल में बच्चों को रोककर रखना और उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना बड़ी चुनौती है। शिक्षा मंत्री ने कार्यालयों में अटैच शिक्षकों को मूल स्कूलों में वापस भेजने का निर्देश दिया है। यह निर्णय निश्चित रूप से सराहनीय है। वर्षों से यह शिकायत सामने आती रही है कि बड़ी संख्या में शिक्षक स्कूलों की बजाय विभिन्न कार्यालयों में संलग्न हैं, जिससे ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों का संकट और गहरा गया है। यदि इस निर्देश का ईमानदारी से पालन होता है, तो इसका सकारात्मक असर दिखाई दे सकता है। वहीं 2027-28 से नया शैक्षणिक सत्र 1 अप्रैल से शुरू करने का फैसला भी निजी स्कूलों की तर्ज पर शिक्षा व्यवस्था को व्यवस्थित करने की कोशिश माना जा सकता है।

    लेकिन यह भी तभी सफल होगा जब पाठ्यपुस्तक, गणवेश, साइकिल और शिक्षकों की उपलब्धता समय पर सुनिश्चित हो। अन्यथा कैलेंडर बदलने से व्यवस्था नहीं बदलेगी। असल में छत्तीसगढ़ की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को आज केवल आदेशों और निर्देशों की नहीं, बल्कि जमीनी सुधारों की जरूरत है। पहाड़े और बारहखड़ी बच्चों की शिक्षा की बुनियाद हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन मजबूत बुनियाद के लिए मजबूत स्कूल, पर्याप्त शिक्षक और बेहतर संसाधन भी उतने ही आवश्यक हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों के दिमाग में सिर्फ पहाड़े ही नहीं, बल्कि उनके सामने एक बेहतर भविष्य की तस्वीर भी तैयार हो। शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन केवल याद किए गए पहाड़ों से नहींए बल्कि स्कूलों की वास्तविक स्थिति और बच्चों के सीखने के स्तर से होना चाहिए।

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