नई दिल्ली 9 सितंबर 2026। छात्रों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। CJP के विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किए जाने पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा चुका है, तो मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस कैसे जारी कर दिया ? बुधवार को सुनवाई के दौरान वकील ने अदालत को बताया कि नोटिस पुलिस के अनुरोध पर जारी किया गया था। हालांकि बाद में नोटिस वापस ले लिया गया। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और कहा कि संबंधित मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।
CJI सूर्यकांत ने मामले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश बिल्कुल स्पष्ट था। जब शीर्ष अदालत पहले ही छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दे चुकी थी, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी करने का आधार क्या था ? पीठ ने इस पूरे घटनाक्रम पर जवाब मांगने की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब सवाल यह है कि क्या स्थानीय प्रशासन ने शीर्ष अदालत के आदेश की सही व्याख्या नहीं की या फिर पुलिस के अनुरोध पर कार्रवाई करते समय अदालत के निर्देशों को नजरअंदाज किया गया?
छात्र से मांगा गया था 5 लाख रुपये का मुचलका
यह मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। अधिकारियों के मुताबिक, जंतर-मंतर पर CJP की अगुवाई में हुए विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस जारी किया था। नोटिस में छात्र से शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका भरने को कहा गया था। हालांकि बाद में यह नोटिस वापस ले लिया गया। लेकिन नोटिस जारी होने की प्रक्रिया पर अब सुप्रीम कोर्ट ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर में आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश दिया था।
ऐसे में नोटिस जारी होने को लेकर अदालत की नाराजगी और बढ़ गई। CJI ने स्पष्ट किया कि जब छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी, तो उसके बाद कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया जाना समझ से परे है। भले ही प्रशासन ने नोटिस वापस ले लिया हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे केवल नोटिस वापस लेने तक सीमित नहीं रखा है।अदालत अब यह जानना चाहती है कि नोटिस जारी करने की पूरी प्रक्रिया क्या थी, पुलिस ने किस आधार पर इसका अनुरोध किया और मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद नोटिस जारी करने का फैसला क्यों लिया। इसी वजह से संबंधित मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगे जाने की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से उठे कई सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती का संदेश साफ है—शीर्ष अदालत के आदेश के बाद निचले स्तर पर होने वाली किसी भी कार्रवाई को उसके अनुरूप होना जरूरी है। अब संबंधित मजिस्ट्रेट के स्पष्टीकरण से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि छात्र को नोटिस किन परिस्थितियों में जारी किया गया था। फिलहाल नोटिस वापस लिया जा चुका है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी ने इस मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। कोर्ट की अगली कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि मजिस्ट्रेट की ओर से क्या स्पष्टीकरण दिया जाता है।


