बिलासपुर 9 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ में शिक्षा के अधिकार कानून की धारा 12(1)(c) के क्रियान्वयन को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से RTE के तहत दाखिले की जमीनी स्थिति का स्कूलवार पूरा ब्यौरा मांगा है। सरकार को यह बताना होगा कि प्रदेश के हर स्कूल में RTE के तहत कितनी सीटें आरक्षित थीं, कितने बच्चों को दाखिला मिला और कितनी सीटें अभी भी खाली हैं। कोर्ट ने राज्य में RTE के तहत लागू SOP समेत विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। सरकार को यह पूरी जानकारी तीन सप्ताह के भीतर कोर्ट के सामने पेश करनी होगी। हाईकोर्ट के इस निर्देश के बाद RTE के तहत दाखिले की वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद है।
अभी तक राज्य स्तर पर सामने आने वाले आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि किस स्कूल में आरक्षित सीटों के मुकाबले कितने बच्चों को प्रवेश मिला। अब सरकार को स्कूलवार चार्ट पेश करना होगा। इसमें आरक्षित सीटें, हुए दाखिले और खाली सीटों की जानकारी शामिल होगी। इससे यह भी पता चल सकेगा कि RTE के तहत पात्र बच्चों के लिए निर्धारित सीटों का कितना इस्तेमाल हुआ और किन स्कूलों में सीटें खाली रह गईं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर शपथपत्र और विस्तृत चार्ट दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि शपथपत्र अगली सुनवाई से सात दिन पहले दाखिल किया जाए और उसकी प्रति मामले से जुड़े पक्षों के अधिवक्ताओं को उपलब्ध कराई जाए। मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को होगी।
क्या है RTE की धारा 12(1)(c) ?
RTE कानून की धारा 12(1)(c) के तहत निजी गैर-अनुदान प्राप्त स्कूलों में प्रवेश स्तर पर कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटों का प्रावधान है। इस प्रावधान का उद्देश्य ऐसे बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराना है, जिन्हें आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण बेहतर शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंच हासिल करने में मुश्किल होती है। मामले में इंटरवेनर विकास तिवारी ने कहा कि स्कूलवार आंकड़े सामने आने से यह साफ होगा कि प्रदेश में RTE के तहत पात्र बच्चों को उनके अधिकार का लाभ किस स्तर तक मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि RTE सिर्फ कागजों में लागू रहने वाला कानून नहीं है, बल्कि पात्र बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिलाने की जिम्मेदारी भी तय करता है। हाईकोर्ट के निर्देश को RTE के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब राज्य सरकार को केवल योजना के क्रियान्वयन का दावा करने के बजाय हर स्कूल का वास्तविक आंकड़ा कोर्ट के सामने रखना होगा।


