Health News: अक्टूबर-नवंबर आते ही देश के अधिकांश शहरों में वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ने लगता है। हवा में घुले धूल, धुएं और प्रदूषण के बेहद छोटे कण सांस के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। इनमें PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण सबसे ज्यादा चिंता का विषय हैं, क्योंकि ये फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं और शरीर में सूजन बढ़ाने के साथ दिल की सेहत को भी प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेना कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। ऐसे में सवाल है कि आखिर हवा में मौजूद PM हमारे शरीर में पहुंचकर क्या करता है? आइए, डॉक्टर से समझते हैं कि प्रदूषण फेफड़ों और हार्ट को किस तरह नुकसान पहुंचा सकता है।
पार्टिकुलेट मैटर (PM) हवा में मौजूद बेहद छोटे ठोस कणों और तरल बूंदों का मिश्रण होता है। ये कण वाहनों से निकलने वाले धुएं, फैक्ट्रियों के उत्सर्जन, निर्माण कार्यों और धूल के कारण हवा में फैलते हैं। इनके प्रमुख प्रकार PM10 और PM2.5 हैं। PM10 का व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है, जबकि PM2.5 का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। PM2.5 के कण इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं। इनके संपर्क में आने से श्वसन तंत्र में सूजन हो सकती है और स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
फेफड़ों में पहुंचकर क्या करता है PM2.5 ?
यशोदा हॉस्पिटल के कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विशाल खांते के अनुसार, PM2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कण श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इनके संपर्क में आने से फेफड़ों में सूजन और जलन हो सकती है। इसके कारण खांसी, सांस फूलना, सीने में जकड़न और अस्थमा के लक्षण बढ़ सकते हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित होने और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) जैसी बीमारी का खतरा भी बढ़ सकता है। जिन लोगों को पहले से सांस संबंधी परेशानी है, उन्हें प्रदूषण के दौरान विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
वायु प्रदूषण का असर केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता। PM2.5 जैसे बारीक कणों के संपर्क में आने से शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ सकता है। ये प्रक्रियाएं रक्त वाहिकाओं के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकती हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने का संबंध हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक के बढ़ते जोखिम से पाया गया है। खासकर पहले से हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज से पीड़ित लोगों को प्रदूषण के दौरान अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
शरीर के दूसरे अंगों पर भी पड़ सकता है असर
प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों के प्रभाव को केवल सांस संबंधी बीमारियों तक सीमित नहीं माना जाता। लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने का संबंध शरीर में सूजन, मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याओं और कुछ न्यूरोलॉजिकल जोखिमों से भी पाया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रदूषण के संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को ये बीमारियां होंगी, लेकिन लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं।
बढ़ते प्रदूषण के बीच कुछ सावधानियां अपनाकर हानिकारक कणों के संपर्क को कम किया जा सकता है।
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बाहर निकलने से पहले अपने क्षेत्र का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) जांचें।
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प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर खुले में भारी व्यायाम करने से बचें।
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जरूरत पड़ने पर सही फिटिंग वाला N95 मास्क पहनें।
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घर और आसपास धूम्रपान तथा कचरा जलाने से बचें।
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लगातार खांसी, सांस फूलने या सीने में परेशानी होने पर डॉक्टर से सलाह लें।
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सीने में तेज दर्द या गंभीर सांस की तकलीफ होने पर तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।


