कवर्धा 10 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में भारतीय किसान संघ के नेतृत्व में हुआ ‘बलराम किसान न्याय यात्रा’ का प्रदर्शन अब राजनीतिक बहस के केंद्र में है। 23 मांगों को लेकर हजारों किसानों के सड़क पर उतरने और प्रमुख मार्गों पर चक्काजाम से प्रदेश की विष्णुदेव साय सरकार के सामने किसानों की समस्याओं पर जवाब देने की चुनौती खड़ी हुई है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने इसी मुद्दे पर भाजपा को घेरते हुए सवाल किया है कि…“जब भाजपा के वैचारिक परिवार से जुड़ा भारतीय किसान संघ ही आंदोलन कर रहा है, तो अन्नदाताओं की सुनवाई आखिर कब होगी ? इस आंदोलन की राजनीतिक अहमियत इसलिए भी है कि भारतीय किसान संघ का प्रदर्शन कांग्रेस या किसी विपक्षी दल के नेतृत्व में नहीं हुआ।
कवर्धा में किसानों का आक्रोश, सड़कों पर उतरे हजारों अन्नदाता..
भाजपा सरकार में किसानों की नाराजगी का आलम देखिए,अब भाजपा से ही जुड़ा भारतीय किसान संघ भी हजारों किसानों के साथ सड़कों पर उतर आया है।
किसानों से बड़े-बड़े वादे करने वाली भाजपा सरकार जवाब दे,जब आपके ही वैचारिक परिवार का संगठन आंदोलन कर रहा है, तो अन्नदाताओं की सुनवाई आखिर कब होगी..?
— INC Chhattisgarh (@INCChhattisgarh) October 9, 2026
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने किसानों के प्रदर्शन को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि….“किसानों से बड़े-बड़े वादे करने वाली भाजपा सरकार को जवाब देना चाहिए कि जब उसके वैचारिक परिवार का संगठन ही किसानों के मुद्दों पर सड़क पर उतर आया है, तो किसानों की सुनवाई कब होगी ? कांग्रेस इस प्रदर्शन को भाजपा की किसान राजनीति और जमीनी स्तर पर किसानों की समस्याओं के बीच अंतर दिखाने के प्रयास के रूप में पेश कर रही है। विपक्ष के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि यदि किसान अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, तो सरकार ने उन मुद्दों पर अब तक क्या कदम उठाए हैं।
गन्ना बोनस, धान का भुगतान और सिंचाई—किसानों के मुद्दे क्या हैं ?
कवर्धा में उठी मांगें केवल किसी एक फसल या भुगतान तक सीमित नहीं हैं। आंदोलन से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, किसानों ने गन्ने पर बोनस, गन्ना और बागवानी फसलों के लिए सहायता, धान के भुगतान, सहकारी शक्कर कारखानों की क्षमता बढ़ाने, फसल बीमा और सिंचाई परियोजनाओं जैसे मुद्दे उठाए हैं। इन मांगों का सीधा संबंध किसानों की उत्पादन लागत, आमदनी और खेती के लिए जरूरी संसाधनों से है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती केवल आंदोलन समाप्त कराने की नहीं, बल्कि अलग-अलग मांगों पर ठोस और स्पष्ट जवाब देने की भी है।
चक्काजाम से आम लोग परेशान, प्रशासन पर भी दबाव
आंदोलन के दौरान रायपुर-जबलपुर नेशनल हाईवे-30 सहित कई प्रमुख मार्गों पर यातायात प्रभावित हुआ। इससे यात्रियों और स्थानीय लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा। प्रदर्शन लंबा खिंचने से वाहनों की कतारें लगीं और प्रशासन को यातायात प्रबंधन के लिए प्रयास करने पड़े। यहां सरकार और प्रशासन के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—किसानों की मांगों पर संवाद करना और आम लोगों की आवाजाही तथा जरूरी सेवाओं को बाधित होने से बचाना। आंदोलन का समाधान तभी टिकाऊ होगा, जब प्रदर्शन के कारणों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए। छत्तीसगढ़ की राजनीति में किसान, धान खरीदी, कृषि सहायता और सिंचाई जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ऐसे में भारतीय किसान संघ के आंदोलन ने सरकार के सामने किसानों की मांगों पर अपना रुख स्पष्ट करने का दबाव बनाया है।
कांग्रेस इस स्थिति को राजनीतिक मुद्दा बनाकर सरकार से जवाब मांग रही है। दूसरी ओर सरकार की ओर से मांगों पर बातचीत, निर्णय और समयबद्ध कार्रवाई आंदोलन की दिशा को प्रभावित कर सकती है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस प्रदर्शन का प्रदेशव्यापी राजनीतिक असर कितना होगा। इसका आकलन आगे की सरकारी प्रतिक्रिया और किसान संगठनों के रुख से ही किया जा सकेगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यहीं है कि….क्या साय सरकार 23 मांगों पर बिंदुवार जवाब और समाधान की समय-सीमा सामने रखेगी ? या किसानों का आंदोलन आगे भी जारी रहेगा ? सरकार की अगली पहल ही तय करेगी कि यह गतिरोध बातचीत से सुलझता है या प्रदेश की राजनीति में किसान मुद्दे पर बहस और तेज होती है।


