रायपुर 7 सितंबर 2026।भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती सरकार में गरीब और जरूरतमंदों का पेट भरने के लिए शुरू की गई दाल-भात योजना खुद भूखी रह गई। रायपुर जिले में कभी रोजाना हजारों लोगों को महज 5 रुपये में भरपेट भोजन कराने वाले 14 दाल-भात केंद्र पिछले करीब सात साल से बंद हैं। योजना बंद हुई तो केंद्रों पर ताले लग गए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि केंद्रों को संचालन के लिए दिया गया करीब 8.40 लाख रुपये का बर्तन, फर्नीचर और अन्य सामान भी अब तक विभाग को वापस नहीं मिला। यानी योजना तो बंद हो गई, लेकिन सरकारी सामान की ‘यात्रा’ कहां तक पहुंची, इसका हिसाब अब विभाग तलाश रहा है। विभाग का कहना है कि सामान वापस लेने के लिए संबंधित संस्थाओं को पत्र लिखा जाएगा।
गौरतलब है कि सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल दाल-भात सेंटर में एक समय जरूरतमंदों को सिर्फ 5 रुपये में दाल, चावल, सब्जी और रोटी मिलती थी। जानकारी के मुताबिक जिले में संचालित केंद्रों से हर महीने करीब डेढ़ लाख लोग भोजन करते थे। खाद्य विभाग की ओर से इन केंद्रों को चावल, दाल, नमक और चना उपलब्ध कराया जाता था। लेकिन करीब सात साल पहले केंद्र बंद हुए तो फिर दोबारा शुरू नहीं हो सके। जरूरतमंद आज भी इनके खुलने का इंतजार कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल उन सामानों को लेकर है, जो केंद्र संचालन के लिए संस्थाओं को दिए गए थे। विभागीय जानकारी के अनुसार प्रत्येक संस्था को करीब 60 हजार रुपये कीमत के बर्तन और अन्य सामग्री दी गई थी।
इसमें 70 थाली, 70 गिलास, 70 चम्मच, 6 जग, राइस स्पून, राइस प्लेट, बड़े और छोटे भगौने, कर्छुल, पानी के ड्रम और परात सहित अन्य सामान शामिल थे। इसके अलावा 6 टेबल और 6 कुर्सियां भी दी गई थीं। केंद्र बंद होने के बाद भी यह सामान विभाग को वापस नहीं किया गया। सवाल सिर्फ 8.40 लाख रुपये के सामान का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जिसके तहत इन केंद्रों को चलाने की जिम्मेदारी समितियों और संस्थाओं को दी गई थी। सात साल तक केंद्र बंद रहे, लेकिन सामान वापस लेने की कार्रवाई अब शुरू करने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब योजना बंद हुई थी, तभी सरकारी बर्तन और फर्नीचर का हिसाब क्यों नहीं लिया गया ?
क्या केंद्रों की निगरानी सिर्फ खाना मिलने तक थी या सामान की वापसी की जिम्मेदारी भी किसी की थी ? रायपुर जिले में बंद पड़े प्रमुख दाल-भात केंद्रों में जेल परिसर, आमानाका, कलेक्ट्रेट, स्टेशन चौक, मंत्रालय, खमतराई, तिल्दा, रावाभांठा, उरला, राठौर चौक, तेलघानी नाका, पुराना बस स्टैंड और नवापारा सहित कुल 14 केंद्र शामिल हैं। विडंबना देखिए—गरीबों को सस्ता भोजन देने की योजना बंद हुई और उसके साथ सरकारी बर्तन भी जैसे ‘लापता’ हो गए। अब विभाग पत्र लिखकर उन बर्तनों को वापस मांगने की तैयारी कर रहा है।
गरीबों को भोजन का इंतजार, विभाग को बर्तनों का
दाल-भात केंद्रों के बंद होने से सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ा, जिनके लिए पांच रुपये में मिलने वाला भोजन बड़ी राहत था। आज भी जरूरतमंदों को ऐसे सस्ते भोजन की जरूरत है, लेकिन बंद केंद्रों को दोबारा शुरू करने की दिशा में कोई स्पष्ट पहल सामने नहीं आई है। अब देखना यह होगा कि विभाग सिर्फ बर्तन वापस लेने तक कार्रवाई सीमित रखता है या सात साल से बंद पड़ी योजना को फिर से शुरू करने पर भी कोई फैसला होता है। क्योंकि सरकारी योजना का ताला सिर्फ केंद्र के दरवाजे पर नहीं लगा है—सवाल जवाबदेही पर भी लगा हुआ है।


