कोरबा/गरियाबंद 4 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ में लगातार हो रही बारिश के बीच जर्जर सड़कों का मुद्दा अब सिर्फ ग्रामीणों की परेशानी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह राजनीतिक बहस का मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। कोरबा में ग्रामीण कीचड़ और गड्ढों से भरी सड़क पर बैठकर विरोध कर रहे हैं, तो गरियाबंद में सड़क के गड्ढों में धान का रोपा लगाकर सरकार और प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई गई। दोनों जिलों से सामने आई तस्वीरों ने सड़क निर्माण, गुणवत्ता और रखरखाव को लेकर सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं बस्तर में जर्जर सड़क को लेकर छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने अपने X हैंडल पर वीडियों शेयर कर लिखा कि…“बस्तर के इकलौते मंत्री केदार कश्यप जी, आपके क्षेत्र की जनता बदहाल सड़कों से त्रस्त है। खनिज संसाधनों का दोहन लगातार जारी हैए भारी वाहनों ने सड़कों को छलनी कर दिया है, लेकिन मंत्री जी केवल बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं।
बस्तर के इकलौते मंत्री केदार कश्यप जी, आपके क्षेत्र की जनता बदहाल सड़कों से त्रस्त है।
खनिज संसाधनों का दोहन लगातार जारी है, भारी वाहनों ने सड़कों को छलनी कर दिया है,लेकिन मंत्री जी केवल बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं।
बस्तर की संपदा निकाल रहे हो, कम से कम यहां की जनता को चलने लायक… pic.twitter.com/DAjcpY64Ww
— INC Chhattisgarh (@INCChhattisgarh) September 4, 2026
जर्जर सड़क को लेकर ग्रामीणों के विरोध का पहला मामला कोरबा जिले के ग्राम पंचायत बांगो का है। यहां मिनीमाता बांगो बांध मार्ग पिछले लंबे समय से जर्जर है, जिसकी हालत बारिश में और भी ज्यादा खराब हो गयी है। सड़क मरम्मत के नाम पर मिल रहे आश्वासनों से तंग आकर ग्रामीणों का गुस्सा आज फूट पड़ा। और नाराज ग्रामीणों ने जर्जर कीचड़ से भरे मार्ग पर ही बैठकर विरोध प्रदर्शन किया। ग्रामीणों के बताया कि यह सड़क पिछले करीब 10 वर्षों से खराब है। बारिश के कारण सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढों में पानी और कीचड़ भर गया है। जिससे इस रास्ते से गुजरने वाले लोगों के साथ हादसा होने का डर बना रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि इस सड़क से स्कूली बच्चों, ग्रामीणों और दूसरे राहगीरों को रोजाना परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन कभी भी स्थानीय प्रशासन और जवाबदार विभाग ने इस मार्ग पर ध्यान नहीं दिया गया। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जवाबदार विभाग द्वारा सड़क मरम्मत के नाम पर गड्ढों में मिट्टी डालकर खानापूर्ति किया जाता रहा है, जिससे पहली ही बारिश में मिट्टी बह जाने के बाद सड़क फिर उसी स्थिति में पहुंच जाती है।
गरियाबंद में जर्जर सड़क के गड्ढो में कर दी धान की रोपाई
गरियाबंद में गौरघाट, देहारगुड़ा और गिरहोला के ग्रामीणों ने जर्जर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क पर धान की रोपाई कर विरोध किया। ग्रामीणों का दावा है कि यह सड़क करीब तीन वर्षों से खराब है और बारिश के बाद इसकी स्थिति और भी खराब हो गई है। ग्रामीणों ने सड़क के गड्ढों और कीचड़ को लेकर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की और चेतावनी दी कि समय पर मरम्मत नहीं हुई तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। राजनीतिक तौर पर देखें तो ग्रामीणों का यह प्रदर्शन सरकार के लिए इसलिए भी चुनौती बन सकता है, क्योंकि ग्रामीण सड़क और बुनियादी सुविधाएं सीधे जनता के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मुद्दे हैं। फिलहाल कोरबा और गरियाबंद में ग्रामीणों ने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है। गरियाबंद के ग्रामीणों ने आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है, जबकि कोरबा में जनपद सदस्य आयुष सिंह के समझाने के बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ। अब नजर इस बात पर है कि संबंधित विभाग इन सड़कों की मरम्मत को लेकर क्या कदम उठाते हैं। क्योंकि बारिश का मौसम सिर्फ सड़कों की मजबूती की परीक्षा नहीं ले रहा, बल्कि सरकार के विकास के दावों की भी परीक्षा ले रहा है।
सड़क का मुद्दा, सियासत के लिए बड़ा सवाल
छत्तीसगढ़ में ग्रामीण सड़कें लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रही हैं। ऐसे में बारिश के दौरान जर्जर सड़कों की तस्वीरें सामने आने से विपक्ष को सरकार को घेरने का एक और मुद्दा मिल गया है। बस्तर की जर्जर सड़कों को लेकर छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर वीडियो साझा कर वन मंत्री केदार कश्यप पर निशाना साधा है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि बस्तर में खनिज संसाधनों के लगातार दोहन और भारी वाहनों की आवाजाही से सड़कें बदहाल हो गई हैंए जबकि क्षेत्र के मंत्री केवल बड़े.बड़े दावे कर रहे हैं। कांग्रेस ने कहा कि यदि बस्तर की संपदा का लगातार दोहन हो रहा है, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वहां की जनता को कम से कम बेहतर और चलने लायक सड़कें उपलब्ध कराई जाएं। कांग्रेस के इस हमले से जर्जर सड़कों का मुद्दा अब सियासी बहस का हिस्सा बनता दिख रहा है।
सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर
सरकार और संबंधित एजेंसियां सड़क कनेक्टिविटी सुधारने और ग्रामीण इलाकों तक बेहतर सुविधाएं पहुंचाने की बात करती हैं। लेकिन कोरबा और गरियाबंद से सामने आए विरोध के ये तरीके जमीनी स्तर पर अलग तस्वीर दिखा रहे हैं। एक तरफ विकास और बेहतर सड़क व्यवस्था के दावे हैं, दूसरी तरफ ग्रामीण कीचड़ में बैठकर विरोध और सड़क पर धान की रोपाई करने को मजबूर हैं। यही विरोधाभास अब राजनीतिक सवाल बन रहा है। जनता की परेशानी से बड़ा राजनीतिक मुद्दा क्या ?


