कोरबा 20 जुलाई 2026। कोरबा में 16 साल की लंबी प्रतीक्षा, अनगिनत दुआएं और संतान पाने की आस…जब आखिरकार ओझा परिवार के आंगन में जुड़वा बच्चों की किलकारी गूंजी, तो लगा मानो बरसों का इंतजार खत्म हो गया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। निजी हाॅस्पिटल के डाॅक्टर की लापरवाही ने महज 48 घंटे के भीतर खुशियां छीन लीं। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टरों ने समय रहते बच्चों की गंभीर हालत को नहीं समझा और बेहतर इलाज के लिए रेफर करने में देरी कर दी, जिसके कारण दोनों नवजात शिशुओं की मौत हो गयी। अब यह मामला सिर्फ दो मासूमों की मौत का नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल बन गया है।
जानकारी के मुताबिक परशुराम नगर दादर निवासी शशिकांत ओझा की पत्नी ने 17 जुलाई को कोरबा के आयुष्मान अस्पताल में जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था। करीब 16 साल बाद संतान सुख मिलने से पूरे परिवार में खुशियों का माहौल था। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। जन्म के कुछ घंटों बाद ही दोनों नवजात शिशुओं में पीलिया के लक्षण दिखाई देने लगे। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने तत्काल अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों को इसकी जानकारी दी, लेकिन बच्चों की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें किसी शिशु रोग विशेषज्ञ या उच्च चिकित्सा केंद्र में रेफर करने के बजाय आयुष्मान अस्पताल में ही भर्ती रखकर इलाज जारी रखा गया। परिजनों का कहना है कि समय पर उचित उपचार और हायर सेंटर रेफर नहीं किए जाने के कारण दोनों नवजातों की हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
जब-जब उन्होंने डॉक्टरों से बच्चों की गंभीर स्थिति को लेकर चिंता जताई, तब-तब उन्हें यही आश्वासन दिया जाता रहा कि इलाज से बच्चे जल्द स्वस्थ हो जाएंगे। लेकिन अस्पताल के इन दावों के बीच दोनों मासूमों की तबीयत लगातार खराब होती रही। परिवार का आरोप है कि जब एक नवजात की हालत बेहद नाजुक हो गई, तब उसे दूसरे निजी अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। वहां इलाज के दौरान पहले नवजात ने दम तोड़ दिया। इस बीच दूसरे बच्चे की तबीयत बिगड़ने लगी। उसे शहर के एक शिशु रोग विशेषज्ञ के पास ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने हालत अत्यंत गंभीर बताते हुए तत्काल बिलासपुर रेफर कर दिया। बिलासपुर के निजी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे दूसरे नवजात ने भी रविवार रात इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। महज 48 घंटे के भीतर 16 साल बाद घर आई खुशियां हमेशा के लिए मातम में बदल गईं।
16 साल की दुआएं…दो दिनों में मातम में बदलीं खुशियां
जिस परिवार ने वर्षों बाद बच्चों के स्वागत की तैयारियां की थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। परिजनों का कहना है कि अगर डॉक्टर समय रहते दोनों बच्चों को हायर सेंटर भेज देते, तो शायद आज दोनों जिंदा होते। उनकी आंखों में अब सिर्फ एक सवाल है….क्या थोड़ी सी संवेदनशीलता और समय पर लिया गया फैसला उनके बच्चों की जिंदगी बचा सकता था ?
पहले बच्चे की मौत के बाद अस्पताल में फूटा गुस्सा
पहले नवजात की मौत के बाद परिजन अस्पताल पहुंचकर डॉक्टरों और प्रबंधन से जवाब मांगने लगे। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय मेडिकल नियमों का हवाला देना शुरू कर दिया। इससे विवाद बढ़ गया और अस्पताल स्टाफ तथा परिजनों के बीच तीखी बहस और धक्का-मुक्की की नौबत आ गई। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया।
अस्पताल ने आरोपों से किया इनकार
अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि दोनों नवजातों की हालत पर लगातार निगरानी रखी जा रही थी। पीलिया के लक्षण सामने आने के बाद आवश्यक उपचार शुरू किया गया और चिकित्सकीय स्थिति गंभीर होने पर ही रेफर किया गया। अस्पताल ने इलाज में किसी भी प्रकार की लापरवाही से इनकार किया है। फिलहाल पुलिस ने शिकायत के आधार पर जांच शुरू कर दी है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दोनों मासूमों की मौत इलाज में लापरवाही से हुई या चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण।
लेकिन इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर निजी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या मरीजों की जान से जुड़े फैसलों में समय पर चिकित्सकीय निर्णय लिए जा रहे हैं ? क्या आर्थिक हितों के आगे रेफरल में देरी की जा रही है ? और सबसे बड़ा सवाल….क्या 16 साल बाद आई खुशियों को बचाया जा सकता था ? इन सवालों के जवाब अब जांच से मिलेंगे, लेकिन ओझा परिवार की गोद हमेशा के लिए सूनी हो चुकी है।

