गरियाबंद 11 सितंबर 2026। गरियाबंद के देहारगुड़ा में लंबे समय से अधूरे पड़े पुल का मामला अब सियासी मुद्दा बन गया है। अधूरे पुल के कारण स्कूली बच्चों और ग्रामीणों को बारिश के दौरान जान जोखिम में डालकर आवाजाही करनी पड़ रही है। बच्चों के इस जोखिम भरे सफर का वीडियो सामने आने और मानव अधिकार आयोग के स्वतः संज्ञान के बाद जिला प्रशासन ने मौके का जायजा लिया। शुक्रवार को कलेक्टर रणवीर शर्मा बरसते पानी के बीच देहारगुड़ा पहुंचे और अधूरे पुल का मौके पर निरीक्षण किया। लेकिन इस दौरान कांग्रेस विधायक जनक ध्रुव का गुस्सा अधिकारियों पर फूट पड़ा। कलेक्टर की मौजूदगी में ही विधायक ने अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई और सवाल किया कि आखिर इतने लंबे समय से अधूरा पड़ा पुल अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ।
गौरतलब है कि गरियाबंद जिले के देहारगुड़ा के अधूरे पुल का मामला तब ज्यादा चर्चा में आया, जब बारिश के बीच स्कूली बच्चों के जान जोखिम में डालकर अधूरे पुल से गुजरने का समाचार और वीडियो वायरल हुआ। इसके बाद मानव अधिकार आयोग ने इस मामले पर स्वतः ही संज्ञान लिया गया। जिसके बाद जिला प्रशासन भी करकत में आया और शुक्रवार को कलेक्टर रणबीर शर्मा खुद बारिश के बावजूद मौके पर अधिकारियों की टीम के साथ निरीक्षण करने पहुंचे। लेकिन इस निरीक्षण के दौरान मौके पर पहुंचे कांग्रेस विधायक जनक ध्रुव के सामने ही स्थानीय ग्रामीणों ने अपनी समस्या बताते हुए अफसरों पर मनमानी का गंभीर आरोप लगाया गया।
ग्रामीणों ने बताया कि अफसरों को फोन करने पर उनके द्वारा काॅल रिसीव तक नहीं किया जाता। फिर क्या था विधायक जी का गुस्सा भड़क गया और उन्होने मौके पर ही कलेक्टर के सामने अधिकारिेयों की क्लास लगा दी। निरीक्षण के दौरान विधायक जनक ध्रुव ने अधिकारियों से सवाल करते हुए कहा- “जब मानव अधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है, तब यहां चेहरा दिखाने आ रहे हैं। थोड़ा भी शर्म आता है या नहीं?” विधायक की नाराजगी का केंद्र लंबे समय से अधूरे पड़े पुल का निर्माण था। उनका कहना था कि ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को लंबे समय से परेशानी हो रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी समय रहते समस्या का समाधान नहीं कर पाए।
बच्चों के जोखिम भरे सफर ने खोली व्यवस्था की पोल
देहारगुड़ा में अधूरा पुल सिर्फ एक निर्माणाधीन परियोजना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजमर्रा की परेशानी बन चुका है। बारिश के दौरान पानी बढ़ने से आवागमन और मुश्किल हो जाता है। ऐसे में बच्चों का इसी रास्ते से स्कूल पहुंचना प्रशासनिक निगरानी और विकास कार्यों की गति पर सवाल खड़े करता है। मामला मानव अधिकार आयोग तक पहुंचने के बाद प्रशासनिक सक्रियता बढ़ी है। सवाल यह भी है कि जब समस्या लंबे समय से जमीन पर मौजूद थी, तो प्रशासन को इसकी गंभीरता का पता चलने के लिए आयोग के हस्तक्षेप का इंतजार क्यों करना पड़ा?
विकास कार्यों की धीमी रफ्तार पर उठे सवाल
देहारगुड़ा का मामला अब सरकार के विकास कार्यों की जमीनी हकीकत पर भी सवाल खड़े कर रहा है। एक ओर सरकारें सड़क, पुल और बुनियादी ढांचे को विकास की प्राथमिकता बताती हैं, वहीं दूसरी ओर किसी पुल का लंबे समय तक अधूरा रहना और उसके कारण बच्चों का जोखिम उठाना सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस विधायक की अधिकारियों को लगाई गई फटकार ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे दिया है। अब प्रशासन के निरीक्षण और निर्देशों के बाद लोगों की नजर इस बात पर है कि अधूरा पुल कब पूरा होता है और बच्चों को जोखिम भरे रास्ते से कब मुक्ति मिलती है।


