बिलासपुर 8 सितंबर 2026। उसलापुर रेलवे स्टेशन पर करीब 116 वैगन वाली लांगहाल मालगाड़ी को चालक और गार्ड बदलने के लिए दो बार रोकना रेलवे अधिकारियों को भारी पड़ गया। स्टेशन के निरीक्षण पर पहुंचे दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक तरुण प्रकाश ने जब यह पूरा घटनाक्रम अपनी आंखों के सामने देखा तो उन्होंने अधिकारियों से जवाब-तलब किया और लांगहाल के परिचालन में हुई देरी पर नाराजगी जताई। इसके बाद जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ तत्काल निलंबन के निर्देश दिए गए। जीएम के निर्देश के बाद उसलापुर के मुख्य स्टेशन मास्टर वीके लोधी और क्रू कंट्रोलर एपी चतुर्वेदी को निलंबित कर दिया गया।
जानकारी के मुताबिक मामला बीते शुक्रवार का है। बिलासपुर से कटनी की ओर कोयला लेकर जा रही लांगहाल शाम करीब 4:50 बजे उसलापुर के प्लेटफार्म नंबर-2 पर पहुंची। यहां चालक, सहायक चालक और गार्ड के ड्यूटी परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हुई। करीब 10 मिनट से ज्यादा रुकने के बाद लांगहाल आगे रवाना हो गई। लेकिन कुछ ही देर बाद पीछे जुड़ी दूसरी मालगाड़ी का अंतिम हिस्सा प्लेटफार्म पर पहुंचा तो ट्रेन को दोबारा रोकना पड़ा। इस दौरान पहले से ड्यूटी कर रहा गार्ड उतरा और दूसरे गार्ड ने उसकी जगह ड्यूटी संभाली। इस प्रक्रिया में करीब चार से पांच मिनट लगे। इसके बाद लांगहाल को फिर रवाना किया गया। पूरी प्रक्रिया के दौरान जीएम तरुण प्रकाश मौके पर मौजूद थे।
रेलवे के मुताबिक, लांगहाल को स्टाफ बदलने के लिए बार-बार रोकना परिचालन की दृष्टि से उचित नहीं है। इससे मालगाड़ियों की समयबद्धता प्रभावित होती है और परिचालन में अतिरिक्त समय लगता है। जीएम ने अधिकारियों से पूछा कि जब रेलवे समयबद्ध माल परिवहन पर जोर दे रहा है, तो इस तरह की व्यवस्था से परिचालन की गति कैसे बनी रहेगी। इसके बाद उन्होंने तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए और मुख्य स्टेशन मास्टर वीके लोधी तथा क्रू कंट्रोलर एपी चतुर्वेदी को निलंबित कर दिया गया। इस कार्रवाई के बाद रेलवे के भीतर एक दूसरा सवाल भी चर्चा में है। क्या लांगहाल में चालक और गार्ड बदलने की व्यवस्था सामान्य मालगाड़ी जैसी ही रखी जा सकती है ? दरअसल, जिस ट्रेन को लेकर कार्रवाई हुई उसमें करीब 58-58 वैगन की दो मालगाड़ियों को जोड़कर लांगहाल बनाई गई थी। यानी कुल करीब 116 वैगन।
ऐसी स्थिति में सामने वाले हिस्से का चालक और गार्ड जहां मौजूद होते हैं, वहां से पीछे वाले हिस्से के गार्ड केबिन की दूरी काफी ज्यादा हो जाती है। बताया जा रहा है कि इस मामले में पीछे जुड़ी दूसरी मालगाड़ी का अंतिम गार्ड केबिन प्लेटफार्म से करीब एक से डेढ़ किलोमीटर पीछे था। अगर पूरी लांगहाल को केवल सामने वाले हिस्से में रोककर स्टाफ परिवर्तन किया जाता, तो पीछे वाले गार्ड को अपने गार्ड केबिन तक पहुंचने के लिए ट्रैक के रास्ते करीब एक से डेढ़ किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती।यही स्थिति ड्यूटी पूरी कर चुके गार्ड के सामने भी आती। उसे भी ट्रेन के अंतिम हिस्से तक पहुंचने या वहां से वापस आने के लिए काफी दूरी तय करनी पड़ती।यानी एक तरफ रेलवे समय बचाने के लिए लांगहाल को बार-बार रोकने के पक्ष में नहीं है, वहीं दूसरी तरफ लांगहाल की लंबाई के कारण रनिंग स्टाफ को निर्धारित स्थान तक पहुंचाने की व्यावहारिक चुनौती भी सामने आती है।
अब सवाल व्यवस्था पर भी
इस घटना में दो अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या रेलवे को लांगहाल में चालक और गार्ड के परिवर्तन की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करनी चाहिए ? 116 वैगन लंबी ट्रेन में आगे और पीछे तैनात स्टाफ के बीच इतनी दूरी होती है कि सामान्य स्टाफ परिवर्तन की व्यवस्था व्यावहारिक नहीं रह जाती। ऐसे में जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें स्टाफ परिवर्तन भी समय पर हो और लांगहाल को बार-बार रोकना भी न पड़े। क्योंकि रेलवे के सामने चुनौती सिर्फ ट्रेन को चलाने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि लांगहाल जैसी लंबी मालगाड़ियों का सुरक्षित, सुचारु और समयबद्ध परिचालन कैसे सुनिश्चित किया जाए। उसलापुर की घटना में अधिकारियों पर कार्रवाई ने रेलवे की सख्ती जरूर दिखा दी है, लेकिन अब देखना होगा कि इस कार्रवाई के बाद लांगहाल में चालक और गार्ड परिवर्तन की व्यवस्था में कोई व्यावहारिक बदलाव होता है या नहीं।


