Matru Navami 2026: सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व माना गया है। यह अवधि पूर्वजों को समर्पित होती है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर 2026 से शुरू हुआ है और 10 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। पितृपक्ष के 16 दिनों में एक दिन विशेष रूप से माताओं और परिवार की दिवंगत महिला पूर्वजों को समर्पित होता है। इसे मातृ नवमी कहा जाता है। इस वर्ष मातृ नवमी रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को है।
मातृ नवमी की तिथि और समय
- मातृ नवमी: रविवार, 4 अक्टूबर 2026
- नवमी तिथि प्रारंभ: 4 अक्टूबर, सुबह 5:52 बजे
- नवमी तिथि समाप्त: 5 अक्टूबर, सुबह 3:54 बजे
परंपरा के अनुसार श्राद्ध कर्म दिन में किया जाता है। आमतौर पर सुबह या दोपहर के समय तर्पण और अन्य श्राद्ध विधियां की जाती हैं। सूर्यास्त के बाद श्राद्ध कर्म नहीं किया जाता।
मातृ नवमी पर किन्हें याद किया जाता है
मातृ नवमी विशेष रूप से परिवार की दिवंगत माताओं को समर्पित मानी जाती है। इस दिन मां, दादी, नानी और परिवार की अन्य दिवंगत महिला पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। परंपरा में उन महिलाओं के लिए इस दिन का विशेष महत्व बताया गया है, जिनका निधन उनके पति के जीवित रहते हुआ था। इसी वजह से मातृ नवमी को अविधवा नवमी या सौभाग्यवती श्राद्ध भी कहा जाता है। यदि परिवार में किसी महिला पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो कई परंपराओं में मातृ नवमी के दिन उनका श्राद्ध करने की मान्यता है।
मातृ नवमी का श्राद्ध कौन कर सकता है
पितृपक्ष में आमतौर पर पुरुषों द्वारा श्राद्ध कर्म किए जाने की परंपरा रही है, लेकिन आज कई परिवारों में महिलाएं भी इन धार्मिक कर्मों में शामिल होती हैं। बहुएं भोजन तैयार करने और परिवार की महिला पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने में भूमिका निभाती हैं। वहीं, कई परिवारों में बेटियां भी अपनी दिवंगत मां या अन्य महिला पूर्वजों के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करती हैं।
घर पर कैसे करें मातृ नवमी का श्राद्ध
घर पर श्राद्ध करने वाले लोग सुबह स्नान करके पूजा स्थल और घर की साफ-सफाई कर सकते हैं। इस दिन सात्विक भोजन तैयार करने की परंपरा है। कई परिवार दिवंगत महिला पूर्वज की पसंद का भोजन भी बनाते हैं।तर्पण की परंपरा में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुशा, काले तिल, जौ और पुष्प के साथ जल अर्पित किया जाता है। तर्पण करते समय पितृ का नाम और गोत्र लिया जाता है।
हालांकि, श्राद्ध और तर्पण की विधि अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में अलग हो सकती है। इसलिए विस्तृत धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपने परिवार की परंपरा या किसी योग्य पुरोहित की सलाह लेना उचित माना जाता है।मातृ नवमी का मुख्य उद्देश्य दिवंगत माताओं और महिला पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।


