कोरबा 17 जुलाई 2026। कोरबा वन मंडल में लकड़ी तस्करों पर भरोसा करना वन विभाग के अधिकारियों के लिए अब गले की हड्डी बन गया है। हैरानी की बात यह है कि विभागीय निगरानी में काटे गए लाखों रुपये मूल्य के पेड़ों के विशाल लट्ठे वन डिपो पहुंचने के बजाय कथित तौर पर पड़ोसी जिले भेज दिए गए। लेकिन वन विभाग के जवाबदार अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। सीएसईबी के अफसर की सूचना के बाद वन विभाग की नींद खुली और अब मामला सामने आने के बाद जिम्मेदार रेंजर ने पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने वन विभाग के कामकाज और कुछ अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक पूरा मामला कोरबा वन मंडल के कोरबा रेंज का है। बताया जा रहा है कि सीएसईबी पूर्व कॉलोनी में बड़ी संख्या में सूखे पेड़ मौजूद थे, जिनसे कभी भी दुर्घटना होने की आशंका थी। सीएसईबी प्रबंधन ने नियमानुसार वन विभाग से अनुमति मांगी। वन विभाग के प्रतिवेदन के आधार पर अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ने 207 सूखे पेड़ों की कटाई की अनुमति दी। इसके बाद सीएसईबी ने निर्धारित राशि भी वन विभाग में जमा करा दी। बताया जा रहा है कि इसके बाद वन विभाग के अफसर ने पेड़ कटाई की जिम्मेदारी कोरबा रेंज के बजाय कुदमुरा रेंजर विक्रांता सिंह कंवर को सौंपी गई। नए पदस्थ रेंजर को स्थानीय मजदूरों और ठेकेदारों की जानकारी नहीं थी।
ऐसे में उन्होंने कोरबा रेंज के एक अधिकारी से पेड़ कटाई के संबंध में सलाह ली। सूत्रों की माने तो इसी अधिकारी ने सुनील गुप्ता नामक व्यक्ति का नाम सुझाया, जो पहले भी लकड़ी तस्करी के मामलों में वन विभाग की कार्रवाई झेल चुका है। बताया जा रहा है कि 29 जून को सीएसईबी क्लब के आसपास सात विशाल पेड़ों की कटाई की गई। उनके बड़े-बड़े लट्ठे मौके पर ही पड़े थे और इन्हें वन विभाग के डिपो में जमा कराया जाना था। लेकिन 14 जुलाई को जब सीएसईबी के कार्यपालन अभियंता ने उन लट्ठों को एक भारी वाहन में लोड होते देखा, तब पूरे मामले का खुलासा हुआ। उन्होंने तत्काल इसकी सूचना वन विभाग को दी। सूचना मिलते ही जिम्मेदार रेंजर ने संबंधित व्यक्ति से पूछताछ की।
आरोप है कि सुनील गुप्ता ने स्वीकार किया कि लकड़ी को वन डिपो में जमा कराने के बजाय बिना किसी वैधानिक अनुमति के अभनपुर भेज दिया गया। इस जानकारी के बाद जवाबदार रेंजर के हाथ-पांव फुल गये, उसने तुरंत इस बात की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी। जिसके बाद वन विभाग के अफसरों के निर्देश पर लकड़ी तस्कर सुनील गुप्ता के खिलाफ सिविल लाइन थाना में एफआईआर दर्ज कराया गया। इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल यही है कि जिस व्यक्ति का नाम पहले से लकड़ी तस्करी के मामलों में सामने आ चुका था, उसी पर सरकारी लकड़ी की जिम्मेदारी आखिर किस आधार पर सौंपी गई ? क्या वन विभाग के अधिकारियों को उसका रिकॉर्ड नहीं मालूम था, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं ?
क्या बिना मिलीभगत संभव है लाखों की लकड़ी गायब होना ?
बड़े आकार के पेड़ों के लट्ठों को काटना, उन्हें मौके पर रखना, फिर भारी वाहन में लोड कर दूसरे जिले तक भेज देना, यह सब बिना विभागीय जानकारी के कैसे संभव हुआ ? क्या किसी अधिकारी ने परिवहन की निगरानी नहीं की ? क्या लकड़ी के डिपो तक पहुंचने का कोई सत्यापन नहीं किया गया ? इन सवालों का जवाब अभी तक सामने नहीं आया है।
पहले भी लगे हैं आरोप
आपको बता दे जिस सुनील गुप्ता पर लकड़ी चोरी का आरोप लग रहा है, उसका नाम ऐसे तस्करी के मामलों में पहले भी सामने आ चुका है। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि हर बार विभाग के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों की कथित मिलीभगत से मामलों को कमजोर कर दिया जाता है, जिससे तस्करों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल लकड़ी चोरी का मामला नहीं, बल्कि वन संपदा की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
जांच सिर्फ तस्कर तक सीमित क्यों ?
एफआईआर दर्ज होना कार्रवाई की शुरुआत हो सकती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जांच केवल लकड़ी ले जाने वाले व्यक्ति तक सीमित रहेगी, या फिर उन अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी जिन्होंने कथित तौर पर विवादित व्यक्ति पर भरोसा किया, निगरानी नहीं की और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहे ? जब तक इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक वन विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में ही रहेगी।

