बिलासपुर 12 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पुलिस हिरासत के दौरान श्रवण सूर्यवंशी की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा दखल दिया है। कोर्ट ने मामले की जांच CBI को सौंपने का आदेश दिया है। साथ ही छत्तीसगढ़ सरकार को मृतक के परिवार को 25 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के दौरान अगर किसी पुलिस अधिकारी या अन्य सरकारी कर्मचारी की हिरासत में हुई हिंसा में भूमिका सामने आती है, तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
जानकारी के मुताबिक मामला बिलासपुर के सीपत थाना क्षेत्र का है। पुलिस ने 18 जनवरी 2024 को 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी को कच्ची महुआ शराब रखने के आरोप में हिरासत में लिया था। आरोप था कि उसने अपनी किराना दुकान के सामने करीब 1,200 रुपये की कच्ची महुआ शराब बिक्री के लिए रखी थी। हिरासत में लिए जाने के तीन दिन बाद 21 जनवरी 2024 को अस्पताल में श्रवण की मौत हो गई। इसके बाद उसकी मौत को लेकर पुलिस कार्रवाई और हिरासत में उसके साथ हुई कथित हिंसा पर गंभीर सवाल उठे। श्रवण की मौत के बाद जेल अधीक्षक ने 22 जनवरी 2024 को सेशन जज को पत्र लिखकर न्यायिक जांच की मांग की थी।
इसके बाद मजिस्ट्रेट स्तर पर जांच हुई और जुलाई 2024 में रिपोर्ट पेश की गई। न्यायिक जांच रिपोर्ट में कहा गया कि भोथरे हथियार से सिर में लगी चोट के बाद उत्पन्न जटिलताओं के कारण श्रवण की मौत हुई थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि इस मामले में FIR 30 जुलाई 2026 को दर्ज की गई। यानी श्रवण की मौत के करीब ढाई साल बाद FIR दर्ज हुई। FIR में इतनी देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। कोर्ट ने यह जानना चाहा कि न्यायिक जांच में सिर की चोट और मौत से जुड़े तथ्य सामने आने के बावजूद आपराधिक कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई।
श्रवण की पत्नी और उसकी दो बेटियों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मामले की स्वतंत्र जांच और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी। हाईकोर्ट ने परिवार को एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन FIR दर्ज करने या स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने का निर्देश नहीं दिया गया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक लाख रुपये के मुआवजे को बेहद कम माना और अब राज्य सरकार को 25 लाख रुपये अंतरिम मुआवजे के तौर पर देने का आदेश दिया है।
CBI सिर्फ मौत नहीं, अधिकारियों की भूमिका भी जांचेगी
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक CBI केवल श्रवण की हिरासत में मौत की परिस्थितियों की जांच नहीं करेगी, बल्कि यह भी जांचेगी कि न्यायिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद राज्य के अधिकारियों ने उचित कार्रवाई क्यों नहीं की। CBI को नियमित आपराधिक केस दर्ज कर जांच करने और जांच की जिम्मेदारी किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
DGP के जवाब पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान राज्य के DGP की ओर से FIR में देरी को लेकर कहा गया कि न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस विभाग को नहीं मिली थी।इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि यही रिपोर्ट राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे के साथ पहले ही पेश की जा चुकी थी। DGP की ओर से यह भी कहा गया कि रिपोर्ट में ऐसा कोई संज्ञेय अपराध सामने नहीं आया था, जिसके आधार पर FIR दर्ज करना जरूरी हो। इस दलील पर कोर्ट ने राज्य की कार्रवाई को लेकर नाराजगी जाहिर की।
एक सप्ताह में CBI को सौंपना होगा पूरा रिकॉर्ड
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के DGP को निर्देश दिया है कि मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड एक सप्ताह के भीतर विशेष दूत के जरिए CBI निदेशक को सौंपे जाएं। CBI को जांच जल्द पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं। जांच अधिकारी की रिपोर्ट 13 अक्टूबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी जाएगी।
चार सप्ताह में परिवार को मिलेंगे 25 लाख
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि चार सप्ताह के भीतर 25 लाख रुपये याचिकाकर्ता के बैंक खाते में जमा किए जाएं। यह राशि अंतरिम मुआवजे के तौर पर दी जाएगी। अंतिम मुआवजे की राशि का फैसला मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि श्रवण परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था और उसकी मौत पुलिस हिरासत के दौरान हुई हिंसा से जुड़ी बताई गई है।अब इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि श्रवण की हिरासत में मौत की असली वजह क्या थी, न्यायिक जांच के बाद भी FIR में ढाई साल की देरी क्यों हुई और इस पूरे घटनाक्रम के लिए आखिर कौन जिम्मेदार था? इन सवालों के जवाब CBI की जांच से सामने आने की उम्मीद है।


