कोरबा कोरबा 1 अगस्त 2026। “सरजी आप ही बताइये क्या आदिवासी गंवार हैं ? हमारे कपड़े देखकर हमें जज किया जाता है ?हमारे माता-पिता को गंवार कहा जाता है ?” ये सवाल किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि उन आदिवासी छात्रों के हैं, जिनके बेहतर भविष्य के लिए सरकार ने एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था बनाई है। लेकिन कोरबा जिले के छुरी स्थित एकलव्य विद्यालय से शनिवार को जो तस्वीर सामने आई, उसने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी को उजागर कर दिया। विद्यालय में बुनियादी सुविधाओं की कमी और कथित अभद्र व्यवहार से नाराज छात्र सड़क पर उतर आए। उन्होंने कटघोरा-कोरबा मार्ग पर चक्काजाम कर दिया और मीडिया के सामने अपनी शिकायतें खुलकर रखीं।
कोरबा के छुरी स्थित एकलव्य विद्यालय में व्याप्त समस्या को लेकर छात्र अब उग्र होते जा रहे है। पिछले दिनों कटघोरा विधायक की गाड़ी रोककर अपनी समस्या बताने के बाद भी त्वरित निराकरण नहीं होने से नाराज छात्रों ने शनिवार को छुरी मुख्यमार्ग पर बैठकर चक्काजाम कर दिया। छात्रों के सड़क पर उतरने की खबर जैसे ही पुलिस-प्रशासन और मीडिया को हुई सभी मौके पर पहुंचे। सभी को उम्मींद थी कि एक बार फिर नाराज छात्रों को जांच और जल्द ही समस्या का निराकरण का हवाला देकर आंदोलन समाप्त करा लिया जायेगा। लेकिन मीडिया के कैमरों के सामने छात्रों के जो तेवर सामने आये, उसे देखकर अधिकारी भी हैरान रह गये।
प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने छात्रावास में साफ पेयजल की कमी, भोजन की खराब गुणवत्ता और अन्य बुनियादी सुविधाओं की समस्या उठाई। उनका आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्याओं का समाधान नहीं किया गया। हालांकि सबसे गंभीर आरोप सम्मान और संवेदनशीलता से जुड़ा था। छात्रों ने मीडिया के सामने दावा किया कि परिसर में उनके पहनावे को देखकर उन्हें जज किया जाता है और उनके परिजनों को कथित तौर पर “गंवार” कहकर संबोधित किया जाता है। DW हिन्दी इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता, लेकिन यदि जांच में ये सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल स्कूल प्रबंधन की लापरवाही का नहीं, बल्कि आदिवासी छात्रों के सम्मान और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा गंभीर विषय होगा।
सरकारी दावों पर उठे सवाल
एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों की शुरुआत दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुरक्षित छात्रावास, बेहतर भोजन और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। इन विद्यालयों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं।लेकिन जब इन्हीं विद्यालयों के छात्र सड़क पर उतरकर पीने के पानी, भोजन और सम्मान की मांग करते दिखाई दें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या योजनाओं का लाभ वास्तव में उन बच्चों तक पहुंच रहा है, जिनके लिए इन्हें शुरू किया गया था।
प्रशासन ने दिया जांच का भरोसा
चक्काजाम की सूचना मिलते ही एसडीएम, कटघोरा पुलिस और आदिवासी विकास विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने छात्रों और उनके परिजनों से बातचीत की और शिकायतों की जांच कर आवश्यक कार्रवाई का लिखित आश्वासन दिया। इसके बाद छात्रों ने प्रदर्शन समाप्त कर दिया।अब निगाहें इस बात पर हैं कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं। यदि छात्रों के आरोप सही साबित होते हैं, तो सवाल केवल एक विद्यालय का नहीं रहेगा, बल्कि उस व्यवस्था का होगा, जो आदिवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा और सम्मानजनक माहौल देने का दावा करती है। वहीं यदि आरोप गलत पाए जाते हैं, तो इसकी भी स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए। फिलहाल, छात्रों के उठाए सवालों ने एक बार फिर सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है।

