बिलासपुर 21 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ विधानसभा का मानसून सत्र खत्म होने के बाद कांग्रेस अब सड़क की राजनीति को धार देने की तैयारी में दिख रही है। बिलासपुर में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत के सामने आये ताजा बयान से साफ संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस अब केवल राज्य सरकार की नीतियों पर ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार से जुड़े राष्ट्रीय मुद्दों को भी प्रदेश की राजनीति का हिस्सा बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। बिलासपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान डॉ. महंत ने अविश्वास प्रस्ताव, कानून-व्यवस्था, किसानों, युवाओं और शिक्षकों के मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरा।
डॉ. चरणदास महंत ने आरोप लगाया कि विधानसभा में कांग्रेस ने 136 मुद्दे उठाए, लेकिन सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई का हवाला देते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का आरोप भी लगाया। डाॅ.महंत के इस बयान के बाद राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस अब छत्तीसगढ़ में केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहना चाहती। दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन, विपक्ष पर कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे राष्ट्रीय मुद्दों को प्रदेश की राजनीति से जोड़कर भाजपा के खिलाफ व्यापक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। यही वजह है कि डॉ. चरणदास महंत ने दिल्ली में हुए घटनाक्रम का जिक्र करते हुए इसे लोकतंत्र से जोड़ा और कहा कि विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है।
कानून-व्यवस्था को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी
प्रदेश में लगातार सामने आ रही हत्या, दुष्कर्म, नशे और संगठित अपराध की घटनाओं को कांग्रेस अब सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में पेश कर रही है। विधानसभा सत्र के दौरान भी विपक्ष ने कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार को घेरा था और अब वही मुद्दा जनता के बीच ले जाने की तैयारी दिखाई दे रही है। महंत ने कहा कि प्रदेश की सामाजिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है और गृह विभाग कानून-व्यवस्था संभालने में विफल साबित हुआ है। कांग्रेस की कोशिश है कि जनता के रोजमर्रा से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाया जाए।
‘रामराज्य’ वाले बयान के भी राजनीतिक मायने
बिलासपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान डॉ. महंत का “रामराज्य नहीं, रावणराज” वाला बयान भी राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। भाजपा जहां अपनी राजनीति में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को प्रमुखता देती रही है, वहीं कांग्रेस अब उसी प्रतीकात्मक राजनीति के जरिए भाजपा पर सवाल खड़े कर रही है। इससे स्पष्ट है कि आने वाले समय में वैचारिक और राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है।
मानसून सत्र खत्म होने के बाद कांग्रेस का फोकस अब जनआंदोलनों और सार्वजनिक अभियानों पर रहेगा। किसानों, अतिथि शिक्षकों, बेरोजगार युवाओं, कानून-व्यवस्था और महंगाई जैसे मुद्दों को लेकर कांग्रेस सरकार को लगातार घेरने की रणनीति पर काम कर रही है।दूसरी ओर भाजपा सरकार विकास कार्यों, निवेश, कानून-व्यवस्था में सुधार और जनकल्याणकारी योजनाओं को अपनी ताकत बताकर विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की तैयारी में है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति अब केवल विधानसभा की बहस तक सीमित नहीं रहने वाली। विपक्ष राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों को जोड़कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करेगा, जबकि भाजपा विकास और सुशासन के एजेंडे के साथ जवाबी रणनीति अपनाएगी। ऐसे में आने वाले महीनों में प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप, जनआंदोलन और राजनीतिक ध्रुवीकरण और तेज होने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।

