रायपुर 22 जून 2026। अभनपुर में आयोजित कांग्रेस का 10 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर नेताओं को संगठन मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने और आगामी राजनीतिक रणनीति तैयार करने के लिए लगाया गया था। लेकिन शिविर खत्म होते-होते सबसे बड़ा प्रशिक्षण शायद यही मिल गया कि राजनीति में विचारों से ज्यादा महत्वपूर्ण पोस्टर में अपनी तस्वीर का आकार और स्थान होता है। राहुल गांधी छत्तीसगढ़ आए, संगठन को मजबूत करने का मंत्र दिया, नेताओं से चर्चा की, कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया और वापस दिल्ली लौट गए। लेकिन उनके जाने के बाद कांग्रेस के गलियारों में चर्चा न राहुल गांधी के भाषण की हो रही है, न संगठन की रणनीति की, बल्कि चर्चा इस बात की हो रही है कि पोस्टर में कौन दिखा और कौन गायब रहा।
बताया जा रहा है कि प्रदेश के सह-प्रभारी पोस्टरों से अपने चेहरे गायब देखकर इतने नाराज हो गए कि मामला सीधे हाईकमान तक पहुंच गया। यानी राहुल गांधी का दौरा खत्म होने से पहले शायद किसी ने पोस्टर देखे नहीं, लेकिन दौरा खत्म होते ही नेताओं की नजर सबसे पहले अपनी तस्वीर पर गई। राजनीति के जानकार भी हैरान हैं कि जिस कार्यक्रम में संगठनात्मक प्रशिक्षण दिया जा रहा था। वहां सबसे बड़ा सबक पोस्टर मैनेजमेंट का निकल आया। कांग्रेस के भीतर अब चर्चा इस बात की है कि पोस्टर में जगह मिलना ही शायद असली राजनीतिक प्रमोशन है। दिलचस्प बात यह है कि स्वागत पोस्टरों में कुछ चेहरे इतने बड़े दिखाई दिए कि बाकी नेताओं को शायद मैग्निफाइंग ग्लास लेकर अपनी तस्वीर खोजनी पड़ रही होगी।
कई वरिष्ठ नेताओं की तस्वीरें पोस्टर में मौजूद तो थीं, लेकिन इतनी छोटी कि कार्यकर्ताओं को पहचानने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ जाए। सूत्र बताते हैं कि पोस्टरों में सबसे ज्यादा मौजूदगी पूर्व महापौर एजाज ढेबर और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की रही। अब पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर पोस्टर डिजाइनर ने राजनीतिक संदेश दिया था या फिर किसी की लोकप्रियता का साइज चार्ट जारी कर दिया था। उधर राहुल गांधी ने अपने दौरे के दौरान संगठन को एकजुट रहने, जमीनी स्तर पर काम करने और जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कही। लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं को लगता है कि फिलहाल सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि पोस्टर में उनकी फोटो आखिर गई कहां ?
राजनीतिक गलियारों में तो यहां तक चुटकी ली जा रही है कि कांग्रेस का अगला प्रशिक्षण शिविर शायद ‘पोस्टर विज्ञान और फोटो प्रबंधन‘ विषय पर आयोजित करना पड़े, ताकि भविष्य में किसी नेता को यह शिकायत न रहे कि उसकी तस्वीर कोने में क्यों लगाई गई। फिलहाल कांग्रेस सार्वजनिक तौर पर इसे छोटा मामला बता रही है, लेकिन अंदरखाने पोस्टरों की यह राजनीति बता रही है कि पार्टी में तस्वीरें भले ही कागज पर छपती हों, लेकिन उनके संदेश सीधे नेताओं के दिल तक पहुंचते हैं। और राजनीति का पुराना नियम भी यही कहता है-‘नेता की ताकत मंच पर भाषण से नहीं, कई बार पोस्टर पर उसकी फोटो की साइज से भी मापी जाती है।’’

