रायपुर10 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य के ‘तारा’ कोल ब्लॉक को लेकर सियासी घमासान तेज होता जा रहा है। कोल ब्लॉक का आवंटन अडाणी समूह के CG Syn-Gas and Chemicals Limited को किए जाने के बाद कांग्रेस लगातार केंद्र और राज्य सरकार पर सवाल उठा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बाद अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है। जयराम रमेश ने तारा कोल ब्लॉक की नीलामी को लेकर कई पुराने सरकारी फैसलों और पर्यावरणीय चिंताओं का हवाला दिया है। उन्होंने विशेष रूप से हसदेव अरण्य के जंगलों, आदिवासी समुदायों और लेमरू एलीफेंट रिजर्व को लेकर सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश के इस पत्र के बाद एक बार फिर तारा कोल ब्लाॅक को लेकर सूबे की राजनीति गरमानी तय मानी जा रही है।
जयराम रमेश ने अपने पत्र में दावा किया है कि 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर हसदेव-अरण्य में नए कोल ब्लॉक के आवंटन या नीलामी पर रोक लगाने की मांग की थी। इसके बाद जुलाई 2023 में राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे का भी उन्होंने उल्लेख किया है। जयराम रमेश के मुताबिक, इस हलफनामे में हसदेव-अरण्य में किसी नई खदान के आवंटन या विकास की आवश्यकता नहीं होने की बात कही गई थी। उनके बयान में यह भी कहा गया है कि अक्टूबर 2023 में केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने तारा समेत 40 कोल ब्लॉक को नीलामी प्रक्रिया से डीनोटिफाई किया था।
इसी पृष्ठभूमि में अब तारा ब्लॉक की नीलामी को लेकर कांग्रेस केंद्र और राज्य सरकार से सवाल कर रही है। सांसद जयराम रमेश ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर अपने पत्र को शेयर करते हुए लिखा कि…. “छत्तीसगढ़ में स्थित इकोलॉजी की दृष्टि से संवेदनशील हसदेव-अरण्य इकोसिस्टम के तारा कोल ब्लॉक को हाल ही में मोदानी कारोबारी समूह को दिए जाने पर INC का यह बयान है। इसके साथ जून 2023 में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय कोयला मंत्रालय को लिखा गया एक पत्र भी है, जिसमें तारा सहित 9 कोल ब्लॉक्स को नीलामी से बाहर रखने की विशेष रूप से मांग की गई थी।”
जयराम रमेश ने तारा कोल ब्लॉक के क्षेत्रफल को लेकर भी चिंता जताई है। उनके मुताबिक, यह ब्लॉक करीब 5,000 एकड़ क्षेत्र में फैला है, जिसमें 4,000 एकड़ से अधिक घना जंगल है। उन्होंने दावा किया है कि खनन गतिविधियों के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई करनी पड़ेगी। कांग्रेस का कहना है कि इसका सीधा असर हसदेव के प्राकृतिक वन क्षेत्र और जैव विविधता पर पड़ सकता है। कांग्रेस सांसद ने अपने बयान में लेमरू एलीफेंट रिजर्व का भी उल्लेख किया है। उनका आरोप है कि खनन गतिविधियों का असर हाथियों के आवागमन वाले क्षेत्र पर पड़ सकता है। हसदेव अरण्य में कोयला खनन का मुद्दा लंबे समय से पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों से जुड़ा रहा है। तारा कोल ब्लॉक को लेकर मौजूदा विवाद ने इस पुराने मुद्दे को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
अडाणी समूह से कनेक्शन को कांग्रेस बना रही बड़ा मुद्दा
कांग्रेस के हमले का एक प्रमुख आधार तारा कोल ब्लॉक पाने वाली कंपनी का अडाणी समूह से कथित कारोबारी संबंध है। जयराम रमेश ने अपने बयान में कहा है कि CG Syn-Gas and Chemicals Limited, Mundra Synenergy Ltd की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है और Mundra Synenergy Ltd, Adani Enterprises Ltd की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है। यही कड़ी कांग्रेस के राजनीतिक हमले का बड़ा हिस्सा बन गई है। पार्टी इसे केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकारों की नीतियों से जोड़कर सवाल उठा रही है।
कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन पर भी सवाल
जयराम रमेश ने खनन के बदले दूसरे स्थान पर पेड़ लगाने की व्यवस्था यानी कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन पर भी सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि प्राकृतिक और घने जंगल को काटकर दूसरे स्थान पर पौधे लगाने से उस मूल वन क्षेत्र की जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र की पूरी भरपाई नहीं हो सकती। उन्होंने अपने बयान में 10 लाख से अधिक पेड़ों के कटने की आशंका भी जताई है। हालांकि, ये आंकड़े जयराम रमेश द्वारा लगाए गए दावे हैं और परियोजना से जुड़े आधिकारिक पर्यावरणीय अनुमोदन एवं शर्तों के आधार पर इनके प्रभाव का अंतिम आकलन किया जाना बाकी है।
हसदेव फिर बना बीजेपी-कांग्रेस के बीच सियासी रणभूमि
तारा कोल ब्लॉक का मुद्दा अब सिर्फ खनन परियोजना तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे पर्यावरण, आदिवासी अधिकार, जंगल और अडाणी समूह से जोड़कर सरकार पर हमला कर रही है। वहीं, सरकार की ओर से परियोजना से जुड़े वैधानिक प्रावधानों, पर्यावरणीय मंजूरियों और खनन प्रक्रिया पर स्थिति स्पष्ट किया जाना इस राजनीतिक विवाद में अहम होगा। कुल मिलाकर, तारा कोल ब्लॉक के आवंटन ने हसदेव अरण्य के पुराने विवाद को एक बार फिर छत्तीसगढ़ की राजनीति के केंद्र में ला दिया है। अब देखना होगा कि सरकार कांग्रेस के इन सवालों का क्या जवाब देती है और खनन परियोजना को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।



