कोरबा 1 जुलाई 2026। पुलिस महकमे में तबादले सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया माने जाते हैं, लेकिन जब किसी अधिकारी की नई तैनाती महज 12 घंटे भी नहीं टिक पाए, तो सवाल केवल तबादले तक सीमित नहीं रहते। कोरबा में नगर कोतवाली की नियुक्ति और 12 घंटे के भीतर लाइन अटैच कर देने के फैसले ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर नई बहस छेड़ दी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब शहर लगातार हत्या, नशे और बढ़ते अपराधों को लेकर सुर्खियों में है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल चेहरे बदलने से कानून-व्यवस्था की चुनौतियों का समाधान संभव है या फिर व्यवस्था को मजबूत करने के लिए रणनीति और जवाबदेही में भी बदलाव की जरूरत है ?
कोरबा में बीते 29 जून की दोपहर से 30 जून की शाम तक जो कुछ हुआ, उसने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है। कोतवाली थाना क्षेत्र में दिनदहाड़े हुई हत्या के बाद पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ तिवारी ने तत्कालीन सख्त एक्शन लेते हुए थाना प्रभारी एमबी पटेल को हटाकर कटघोरा थाना प्रभारी धर्मनारायण तिवारी को नगर कोतवाली की कमान सौंपी गयी। एसपी के इस आदेश के बाद नए प्रभारी ने 30 जून की सुबह विधिवत कोतवाली थाना का पदभार भी संभाल लिया। लेकिन इससे पहले कि वे शहर की नब्ज समझ पाते, शाम तक पुलिस विभाग का दूसरा आदेश जारी हो गया। इस आदेश में नवपदस्थ कोतवाल धर्मनारायण तिवारी को रक्षित केंद्र भेज दिया गया और उनकी जगह निरीक्षक प्रमोद डडसेना को कोतवाली का नया प्रभारी बना दिया गया।
यह पूरा घटनाक्रम जितना तेज था, उससे कहीं ज्यादा तेज़ी से शहर में चर्चा का बाजार गर्म हो गया कि…..आखिर ऐसा क्या बदल गया कि सुबह लिया गया फैसला शाम तक बदलना पड़ गया ? यदि पहला निर्णय सही था, तो दूसरा क्यों आया ? और यदि दूसरा निर्णय आवश्यक था तो पहला इतना जल्दबाजी में क्यों लिया गया ? स्वाभाविक है कि जब किसी जिले में लगातार हत्या, नशे से जुड़े अपराध और कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हों, तब लोगों की अपेक्षा होती है कि पुलिस का पूरा ध्यान अपराध नियंत्रण पर हो, लेकिन जब सुर्खियां अपराधियों की बजाय पुलिस विभाग के तबादलों को मिलने लगें, तो यह स्थिति भी चर्चा का विषय बन जाती है। खैर नए नगर कोतवाल को लेकर ऐसा कौन सा फीडबैक सामने आया कि महज 12 घंटे के भीतर ही उन्हें हटाने का फैसला लेना पड़ा, यह फिलहाल विभाग के भीतर की बात है।
पुलिस प्रशासन को अपनी प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का पूरा अधिकार है। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि ऐसे निर्णयों में स्थिरता और स्पष्टता दिखाई दे। बार-बार बदलते आदेश आम लोगों के साथ ही पुलिस महकमे के भीतर भी अनावश्यक चर्चाओं और कयासों को जन्म देते हैं। हालांकि शहर की जनता के लिए असली मुद्दा यह नहीं है कि नगर कोतवाली की कुर्सी पर कौन अधिकारी बैठा है। लोगों की अपेक्षा केवल इतनी है कि अपराधियों में कानून का भय कायम रहे, नशे और अपराध पर प्रभावी अंकुश लगे और शहर में अमन-चैन और कानून-व्यवस्था मजबूत हो। आखिरकार पुलिस की सफलता तबादलों की संख्या से नहीं, बल्कि सड़कों पर दिखने वाली सुरक्षा और जनता के भरोसे से आंकी जाती है।

