बिलासपुर, 30 जून 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक लिव-इन संबंध में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध बनते हैं, तो सामान्यतः इसे आपसी सहमति से बना संबंध माना जाएगा। ऐसे मामलों में यदि बाद में पुरुष शादी से इनकार कर देता है, तो मात्र इसी आधार पर उसे बलात्कार नहीं माना जा सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने एक महिला की अपील पर सुनाया।
महिला ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े भविष्य में शादी करने की इच्छा जता सकते हैं, लेकिन केवल शादी का वादा होना यह साबित नहीं करता कि शारीरिक संबंध उसी वादे के आधार पर बनाए गए थे। अदालत ने कहा कि यदि कोई संबंध लंबे समय तक चलता है, तो यह माना जाएगा कि दोनों पक्षों ने अपनी इच्छा से संबंध स्वीकार किया था और वे उसके परिणामों से भी परिचित थे। पीठ ने यह भी कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता बढ़ी है। ऐसे मामलों की सुनवाई करते समय अदालतों को संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने के बजाय संबंध की अवधि, दोनों पक्षों के व्यवहार और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए।
क्या था मामला ?
मामला 40 वर्षीय एक महिला से जुड़ा है, जो भिलाई नगर निगम में परियोजना प्रबंधक के पद पर कार्यरत है। महिला ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2019 में आईआईएम रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात आरोपी से हुई थी। आरोपी ने शादी का आश्वासन दिया, जिसके बाद दोनों के बीच प्रेम संबंध बने और करीब दो वर्षों तक वे साथ रहे। महिला का आरोप था कि पढ़ाई पूरी होने के बाद आरोपी शादी की बात टालने लगा और बाद में यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उसके परिवार वाले शादी के लिए तैयार नहीं हैं। महिला के अनुसार इसकी वजह उसका तलाकशुदा होना, उम्र में बड़ा होना और अलग धर्म से होना था। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि नवंबर 2021 में आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए। इसके बाद दिसंबर 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 के तहत मामला दर्ज कराया गया।
निचली अदालत ने क्यों किया था बरी?
ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया। अदालत ने पाया कि महिला ने जिरह के दौरान स्वीकार किया था कि वह महिला आयोग के समक्ष 30 लाख रुपये लेकर विवाद समाप्त करने को तैयार थी। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि आरोपी ने समझौते के तहत 15 लाख रुपये का चेक दिया था, हालांकि बाद में भुगतान रोक दिया गया। इसके अलावा महिला ने स्वयं स्वीकार किया था कि दोनों परिवारों की सहमति मिलने पर ही शादी करने पर सहमत हुए थे। वहीं महिला के भाई ने भी गवाही दी कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और उसी के चलते शारीरिक संबंध बने।
मेडिकल रिपोर्ट भी बनी आधार
हाईकोर्ट ने महिला की मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टर की गवाही का भी उल्लेख किया। डॉक्टर ने अदालत को बताया कि जांच के दौरान महिला ने जबरन या अप्राकृतिक यौन संबंध की कोई शिकायत नहीं की थी। मेडिकल परीक्षण में भी किसी प्रकार की ऐसी चोट नहीं मिली, जिससे बलपूर्वक अप्राकृतिक यौन संबंध की पुष्टि होती हो। इन सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इसलिए निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किया जाना उचित था।

