दुर्ग 28 जून 2026। दुर्ग जिले के सरकारी अस्पताल में एक सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित 20 वर्षीय युवती की मौत ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। मौत के बाद सामने आयी जांच रिपोर्ट ने सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग की जांच में खुलासा हुआ है कि फीमेल वार्ड से ब्लड बैंक की दूरी महज 30 से 40 कदम थी, लेकिन ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों ने मरीज की जान बचाने के लिए खुद ब्लड बैंक जाकर खून लाने तक की कोशिश नहीं की। और खून की कमी के कारण 20 साल की दीपिका गाड़ा की असमय मौत हो गयी।
जांच रिपोर्ट में इसे गंभीर लापरवाही माना गया है। जांच अधिकारियों ने स्पष्ट लिखा है कि कर्मचारियों ने मरीज को समय पर रक्त उपलब्ध कराने में कोई रुचि नहीं दिखाई। इसके आधार पर दो लैब टेक्नीशियन और दो स्टाफ नर्स समेत चार संविदा कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। वहीं दो डॉक्टर समेत कुल सात कर्मचारियों को जिम्मेदार माना गया है। कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब ब्लड बैंक अस्पताल परिसर में ही था और वहां 85 यूनिट रक्त उपलब्ध था, तब आखिर मरीज तक खून क्यों नहीं पहुंचा ? यदि जांच में लापरवाही साबित हुई है, तो क्या इसकी जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों की थी ?
अस्पताल की पूरी व्यवस्था की निगरानी करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही आखिर क्यों तय नहीं की गई ? स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई के बाद यह बहस तेज हो गई है कि कहीं पूरे मामले में सिर्फ छोटे कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराकर बड़े अधिकारियों को बचाने की कोशिश तो नहीं की जा रही। जांच से जुड़े तथ्य बताते हैं कि ब्लड बैंक में पर्याप्त रक्त उपलब्ध था। इसके बावजूद गंभीर हालत में भर्ती दीपिका गाड़ा को एक यूनिट रक्त तक नहीं मिल सका। यह सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, बल्कि पूरे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। यदि आपातकालीन स्थिति में भी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग नहीं हो सके, तो फिर ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य क्या रह जाता है?
क्या था पूरा मामला ?
भिलाई के मरोदा निवासी 20 वर्षीय दीपिका गाड़ा सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित थी। 30 मई की रात उसकी तबीयत अचानक बिगड़ने पर परिजन उसे दुर्ग जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। जांच में डॉक्टरों ने बताया कि उसके शरीर में खून की मात्रा बेहद कम है और तत्काल ब्लड चढ़ाने की जरूरत है। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल ने तीन यूनिट रक्त की व्यवस्था करने को कहा। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार तत्काल डोनर की व्यवस्था नहीं कर सका। उन्होंने अस्पताल और ब्लड बैंक से कम से कम एक यूनिट रक्त देकर इलाज शुरू करने की गुहार लगाई, लेकिन उन्हें रक्त उपलब्ध नहीं कराया गया। इलाज के दौरान 1 जून को दीपिका की मौत हो गई।
दीपिका की मां के अनुसार, डॉक्टरों ने बताया था कि उसकी ब्लड रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन केवल 5.5 ग्राम था। परिवार ने अस्पताल प्रबंधन और डाॅक्टरों से गुहार लगायी थी कि पहले एक यूनिट रक्त दे दिया जाए, बाकी की व्यवस्था बाद में कर ली जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। खास बात यह है कि उस समय सिविल सर्जन डॉ. आशीष मिंज ने भी स्वीकार किया था कि ऐसी आपात स्थिति में, यदि मरीज के परिजन तत्काल डोनर उपलब्ध नहीं करा पाते हैं, तो परिस्थितियों को देखते हुए एक या दो यूनिट रक्त दिया जा सकता था।
अब उठ रहे हैं बड़े सवाल
दीपिका की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। जांच रिपोर्ट ने यह तो बता दिया कि लापरवाही हुई, लेकिन कई सवाल अब भी जवाब मांग रहे हैं—जब ब्लड बैंक महज 30–40 कदम की दूरी पर था, तो रक्त मरीज तक क्यों नहीं पहुंचा ? यदि ब्लड उपलब्ध था, तो आपातकालीन प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं हुआ ? क्या सिर्फ संविदा कर्मचारियों पर कार्रवाई कर पूरे मामले की जिम्मेदारी तय हो जाएगी ? अस्पताल प्रबंधन और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा ? क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव किया जाएगा ? दीपिका अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी मौत ने सरकारी अस्पतालों की उस व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है, जहां कई बार संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, जवाबदेही और समय पर निर्णय लेने की कमी मरीज की जान पर भारी पड़ जाती है।

