रायपुर 28 जून 2026। छत्तीसगढ़ में नया शिक्षा सत्र शुरू हो चुका है। स्कूलों की घंटियां फिर गूंजने लगी हैं और सरकार पूरे उत्साह के साथ ’’शाला प्रवेशोत्सव’’ मना रही है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री, विधायक और प्रशासनिक अधिकारी शहर और गांव के स्कूल पहुंचकर बच्चों के साथ शाला प्रवेशोत्सव में शामिल हो रहे हैै। लेकिन इन सारी तैयारियों केे बीच नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट बेटियों की शिक्षा को लेकर एक ऐसी तस्वीर सामने रखती है, जो इस पूरे उत्सव के पीछे छिपी सच्चाई को उजागर करती है।
नीति आयोग रिपोर्ट की बताती है कि छत्तीसगढ़ में बेटियों का सकल नामांकन अनुपात (GER) राष्ट्रीय औसत से नीचे है। प्राथमिक स्तर पर जहां देश में लड़कियों के नामांकन का राष्ट्रीय औसत 92.3 प्रतिशत है, वहीं छत्तीसगढ़ 89.9 प्रतिशत पर है। हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी स्तर पर भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। यह केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि हजारों ऐसी बेटियों की कहानी है, जो आज भी शिक्षा के अधिकार से पूरी तरह नहीं जुड़ पाई हैं।
यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब सरकार वर्षों से बेटियों की शिक्षा के लिए मुफ्त पाठ्यपुस्तक, गणवेश, साइकिल, छात्रवृत्ति, मध्यान्ह भोजन और प्रोत्साहन राशि जैसी अनेक योजनाएं चला रही है। यदि इतनी योजनाओं के बावजूद बड़ी संख्या में बेटियां स्कूल से बाहर हैं, तो सवाल योजनाओं की घोषणा पर नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर उठता है। असल समस्या सिर्फ नामांकन की नहीं, सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत की भी है। आज भी प्रदेश के अनेक स्कूलों में शिक्षकों के पद खाली हैं। कहीं एक ही शिक्षक कई कक्षाओं को पढ़ा रहा है, तो कहीं विज्ञान और गणित जैसे विषयों के शिक्षक महीनों से नहीं हैं।
अनेक स्कूलों में शौचालय या तो बने ही नहीं हैं या उपयोग की स्थिति में नहीं हैं। पेयजल की व्यवस्था अधूरी है, बिजली की समस्या बनी हुई है, प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय केवल कागजों में हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में स्कूल तक पहुंचने के लिए सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था भी नहीं है। किशोरावस्था की बेटियों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण का अभाव भी स्कूल छोड़ने की बड़ी वजह बनता है।ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के साथ-साथ शहरी झुग्गी बस्तियों में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। आर्थिक मजबूरी, घरेलू जिम्मेदारियां, कम उम्र में विवाह और सामाजिक सोच जैसी चुनौतियां आज भी बेटियों की पढ़ाई में बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
ऐसे में केवल प्रवेशोत्सव मनाने या लक्ष्य आधारित नामांकन अभियान चलाने से तस्वीर नहीं बदलेगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या शिक्षा विभाग केवल बच्चों का स्कूल में प्रवेश सुनिश्चित कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ले, या फिर यह भी देखे कि बच्चियां नियमित रूप से स्कूल जाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करें और हायर सेकेंडरी तक अपनी पढ़ाई पूरी करें ? आखिर नीति आयोग की रिपोर्ट में सामने आए इन आंकड़ों की जवाबदेही किसकी है ? क्या शिक्षा मंत्री, विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी और स्थानीय प्रशासन इस स्थिति के लिए जवाबदेह नहीं हैं ? यदि हर वर्ष करोड़ों रुपये शिक्षा पर खर्च हो रहे हैं, तो फिर राष्ट्रीय औसत से पीछे रहने की वजह क्या है ?
नई शिक्षा नीति गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा की बात करती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ के लिए यह आत्ममंथन का समय है। शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल में नाम लिखवा देने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि हर बेटी स्कूल पहुंचे, वहां सुरक्षित महसूस करे, बेहतर शिक्षा पाए और बिना किसी बाधा के अपनी पढ़ाई पूरी कर सके। शाला प्रवेशोत्सव का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब हर बेटी स्कूल के दरवाजे तक ही नहीं, बल्कि अपनी मंजिल तक पहुंचे। शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों के दावे तभी सार्थक होंगे, जब नीति आयोग की अगली रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ बेटियों की शिक्षा के मामले में पिछड़ने वाला नहीं, बल्कि देश के अग्रणी राज्यों में शामिल दिखाई दे।

