रायपुर, 24 जून 2026। बस्तर में नक्सल प्रभाव कम होने के बाद जहां विकास और संरक्षण की नई उम्मीदें जगी हैं, वहीं जंगलों में बढ़ते शिकार, आगजनी और अवैध कटाई की घटनाओं ने नई चिंता पैदा कर दी है। इस बीच एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली और शासन के आदेशों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है। उनका आरोप है कि शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद वन विभाग ने समय पर कार्रवाई नहीं की, जिसके कारण बस्तर में वन अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण की योजना अधर में लटक गई।
वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय सिंघवी के मुताबिक हाल ही में दंतेवाड़ा जिले के राजा बंगला क्षेत्र में बड़ी संख्या में शिकारियों ने जंगल में आग लगाकर वन्यजीवों को बाहर निकालने की कोशिश की। आरोप है कि आग से घबराकर भागने वाले हिरण, जंगली सूअर और अन्य वन्यजीवों को पहले से बिछाए गए जाल और फंदों में फंसाकर शिकार करने की तैयारी थी। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम कथित तौर पर शिकारियों की भारी संख्या के सामने कोई प्रभावी कार्रवाई किए बिना लौट गई।
घटनाओं से चिंतित होकर नितिन सिंघवी ने राज्य शासन को सुझाव दिया था कि दंतेवाड़ा जिले में तैनात जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के जवानों को वन विभाग के साथ संयुक्त अभियान में लगाया जाए। उनका मानना था कि नक्सल विरोधी अभियानों में प्रशिक्षित जवान शिकार, आगजनी और लकड़ी तस्करी जैसे अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं। बताया गया कि शासन ने इस सुझाव को गंभीरता से लिया और 7 मई 2026 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को संयुक्त प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजने के निर्देश दिए।
आदेश था प्रस्ताव भेजने का, विभाग ने मांग लिया अभिमत
विवाद की जड़ यहीं से शुरू होती है। सिंघवी का आरोप है कि शासन ने स्पष्ट रूप से संयुक्त हस्ताक्षरयुक्त प्रस्ताव भेजने को कहा था, लेकिन इसके बजाय लगभग एक महीने बाद पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर डीआरजी की तैनाती पर अभिमत मांग लिया गया।सवाल यह उठ रहा है कि जब शासन स्वयं गृह विभाग के माध्यम से आवश्यक समन्वय स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू करने वाला था, तब वन विभाग ने अतिरिक्त प्रक्रिया अपनाने की जरूरत क्यों महसूस की ?
क्या यह प्रशासनिक विवेक था या फिर आदेशों के पालन में अनावश्यक विलंब ? अपने पत्र में सिंघवी ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर चार में से कोई एक बात सही प्रतीत होती है—या तो संबंधित अधिकारी शासन के निर्देशों को समझ नहीं पाए, या उन्होंने उनका पालन जरूरी नहीं समझा, या वे स्वयं को शासन के आदेशों से ऊपर मानते हैं, अथवा वन एवं वन्यजीव संरक्षण के प्रति पर्याप्त संवेदनशील नहीं हैं। यह आरोप सीधे तौर पर विभाग के शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।
देरी की कीमत कौन चुकाएगा ?
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में शिकार और आगजनी जैसे अपराधों के मामलों में समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि समय रहते प्रभावी संयुक्त अभियान शुरू हो जाता, तो कई घटनाओं को रोका जा सकता था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रशासनिक स्तर पर हुई देरी की कीमत आखिर कौन चुकाएगा….जंगल, वन्यजीव या फिर पूरा पारिस्थितिकी तंत्र ? नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव से पूरे मामले की जांच कर वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक सह हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की मांग की है।
उनका कहना है कि शासन के स्पष्ट निर्देशों का पालन नहीं होने से न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया प्रभावित हुई, बल्कि वन एवं वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को भी नुकसान पहुंचा। फिलहाल इस मामले में वन विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन यह विवाद एक बार फिर उस सवाल को केंद्र में ले आया है कि जब जंगलों और वन्यजीवों पर खतरा बढ़ रहा हो, तब क्या विभागीय प्रक्रियाएं संरक्षण से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती हैं?

