कोरबा 14 अक्टूबर 2026। सरकारी खजाने में बचत करना अच्छी बात है, लेकिन बचत का तरीका भी कभी-कभी चर्चा का विषय बन जाता है। छत्तीसगढ़ के कोरबा में बुधवार को कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां नगर निगम के प्रेस कांफ्रेंस में स्वागत-सम्मान के लिए फूलों के गुलदस्ते तो रखे गए, लेकिन उनकी संख्या ने पूरे आयोजन का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। रामलीला के आयोजन की जानकारी देने के लिए बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में मंत्री, महापौर, जनप्रतिनिधियों और कलाकारों का स्वागत हुआ, लेकिन चर्चा पांच बुके से करीब 15 लोगों के सम्मान की व्यवस्था को लेकर होने लगी। स्वागत का सिलसिला शुरू हुआ तो एक अतिथि को बुके दिया गया। सम्मान पूरा हुआ तो बुके वापस उठा लिया गया और अगले अतिथि के स्वागत के लिए तैयार हो गया। यानी अतिथि बदलते गए, स्वागत होता गया और बुके अपनी अगली पारी के लिए लौटता रहा। कह सकते हैं कि कोरबा निगम ने स्वागत में भी ‘रीयूज और रीसायकल’ का ऐसा मॉडल पेश किया, जिसकी चर्चा अब फूलों से आगे निकल गई है।
दरअसल नगर निगम कोरबा की ओर से 15 अक्टूबर से शुरू होने वाली रामलीला के आयोजन को लेकर पंचवटी विश्राम गृह में पत्रकार वार्ता आयोजित की गई थी। कार्यक्रम में उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन, महापौर संजू देवी राजपूत, एमआईसी सदस्य, निगम के अधिकारी, मुंबई और बनारस से आए मुख्य कलाकारों के साथ बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद थे। रामलीला के भव्य आयोजन की जानकारी देने के लिए आयोजित इस प्रेस कांफ्रेंस में मंत्री देवांगन के पहुंचने के बाद स्वागत-सत्कार का सिलसिला भी शुरू हुआ। लेकिन इस दौरान निगम के अधिकारियों की एक व्यवस्था ने अलग ही सुर्खियां बटोर लीं। स्वागत के लिए रखे गए पांच बुके एक के बाद एक अतिथियों तक पहुंचे और फिर वापस मेज पर लौटते दिखाई दिए। निगम के सचिव रामेश्वर कंवर अतिथियों को बुके देकर सम्मानित करते नजर आए। दिलचस्प बात यह रही कि एक हाथ से बुके देकर सम्मान किया जा रहा था, तो कुछ सेकेंड बाद ही खुद सचिवजी या फिर उनके लगाये कर्मी उसी बूके को उठाकर अगले अतिथि के स्वागत के लिए ले जाते दिखे। इस तरह स्वागत का सिलसिला चलता रहा और बुके भी अपनी जिम्मेदारी निभाते रहे।अतिथि बदलते रहे, चेहरे बदलते रहे, लेकिन बुके की ड्यूटी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी!
50 लाख की रामलीला, लेकिन बुके के बजट पर सवाल !
नगर निगम इस साल रामलीला के भव्य आयोजन पर करीब 50 लाख रुपये खर्च कर रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब बड़े सांस्कृतिक आयोजन के लिए लाखों रुपये का बजट रखा जा सकता है, तो स्वागत-सम्मान के लिए 15 अलग-अलग बुके की व्यवस्था क्यों नहीं की गई ? यहां सवाल किसी फूल के गुलदस्ते की कीमत का नहीं, बल्कि उस सोच का है, जिसमें बड़े आयोजन की भव्यता और छोटी-सी स्वागत व्यवस्था के बीच इतना अंतर नजर आता है। अगर पांच बुके से ही काम चलाना निगम की बचत नीति का हिस्सा था, तो फिर इस नीति को सार्वजनिक रूप से समझाने में हर्ज क्या है ? आखिर 15 लोगों के स्वागत के लिए 15 बुके रखने पर कितना अतिरिक्त खर्च आता ? और पांच बुके को बार-बार इस्तेमाल करके निगम ने कितनी बचत कर ली ? इन सवालों का जवाब सामने आना बाकी है।
मंत्री और महापौर की मौजूदगी में हुए इस कार्यक्रम में बाहर से आए कलाकारों और पत्रकारों के सामने बुके का बार-बार इस्तेमाल चर्चा का विषय बना रहा। जिस प्रेस कांफ्रेंस का मकसद रामलीला के आयोजन को सामने लाना था, वहां स्वागत की इस व्यवस्था ने भी लोगों का ध्यान खींच लिया। अब यह स्पष्ट नहीं है कि पांच बुके के इस्तेमाल के पीछे कोई औपचारिक बचत नीति थी या यह महज आयोजन की व्यवस्था का हिस्सा था। लेकिन तस्वीरों में नजर आए इस घटनाक्रम ने एक सवाल जरूर छोड़ दिया है—क्या सार्वजनिक धन बचाने का मतलब केवल खर्च कम करना है, या फिर खर्च के साथ व्यवस्था और सम्मान का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है ? फिलहाल कोरबा निगम का ‘बुके रोटेशन मैनेजमेंट’ चर्चा में है। बुके पांच थे, स्वागत करीब 15 लोगों का हुआ और सवाल कई खड़े हो गए। कहावत है कि फूलों की खुशबू दूर तक जाती है। इस बार कोरबा में बुके की खुशबू से ज्यादा उसके बार-बार लौटने की चर्चा हो रही है!


