गरियाबंद, 29 अक्टूबर 2026। सरकारें बदलती हैं, अफसरों की जिम्मेदारियां बदलती हैं और सरकारी योजनाओं के नाम पर नए-नए दावे भी सामने आते हैं। लेकिन क्या सरकारी व्यवस्था की रफ्तार इतनी धीमी हो सकती है कि पांच साल में एक प्राथमिक स्कूल का भवन तक पूरा न हो ? पढ़ने और सुनन में आपको शायद अटपटा लगे, लेकिन ये हकीकत है। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड के ग्राम ठेमली पथर्री से सामने आई तस्वीर यही सवाल खड़ा करती है। यहां पांच साल से निर्माणाधीन प्राथमिक शाला भवन आज भी अधूरा है। नतीजा यह कि पांच कक्षाओं के बच्चों को एक ही कमरे में पढ़ने की मजबूरी है। कलेक्टर से लेकर जिला शिक्षा अधिकारी तक शिकायतें पहुंचीं, 2025 और 2026 के सुशासन तिहार में भी आवेदन दिए गए, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक समस्या जस की तस बनी हुई है।
अब विडंबना देखिए—जिस व्यवस्था का काम बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित स्कूल देना है, उसी व्यवस्था से जवाब मांगने के लिए बच्चों और उनके अभिभावकों को 15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। चक्रवात और खराब मौसम के मद्देनजर प्रदेश में स्कूलों की छुट्टी घोषित किए जाने के बीच छात्र और पालक बारिश तथा तेज हवा के बावजूद एसडीएम कार्यालय पहुंचे। वहां उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपते हुए शाला बहिष्कार का ऐलान कर दिया और कहा कि….जब तक स्कूल भवन का निर्माण पूरा नहीं होता, वे बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे। ग्रामीणों के इस ऐलान के बाद जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।
जानकारी के मुताबिक गरियाबंद जिला के मैनपुर विकासखंड के ग्राम ठेमली पथर्री में प्राथमिक शाला भवन का निर्माण पिछले पांच वर्षों से अधूरा पड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि इस दौरान सरकार बदली, प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालने वाले अधिकारी बदले और शिकायतों के लिए कई दरवाजे खटखटाए गए, लेकिन स्कूल भवन की स्थिति नहीं बदली। अभिभावकों के मुताबिक उन्होंने स्कूल भवन का कार्य पूर्ण करने में हो रही देरी को लेकर कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी सहित संबंधित अधिकारियों को आवेदन दिए। यहां तक कि वर्ष 2025 और 2026 के सुशासन तिहार में भी समस्या उठाई गई। इसके बावजूद भवन पूरा नहीं हो सका।
यही वह सवाल है, जिसका जवाब अब व्यवस्था को देना होगा—जब एक गांव के स्कूल भवन की समस्या पांच साल और कई शिकायतों के बाद भी नहीं सुलझी, तो सुशासन के दावों का लाभ आखिर जमीन पर किसे मिल रहा है ? शिकायतें दर्ज होने और आवेदन लिए जाने से आगे बढ़कर समाधान की जिम्मेदारी किसकी है ? और अगर व्यवस्था समय पर एक स्कूल भवन पूरा नहीं करा सकती, तो ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के दावों पर भरोसा कैसे कायम होगा ? सरकार और शिक्षा विभाग की ओर से सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने, बच्चों को बेहतर शैक्षणिक माहौल देने और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की बातें लगातार की जाती हैं।
लेकिन ठेमली पथर्री का मामला इन दावों की जमीनी पड़ताल करने की जरूरत बताता है। एक तरफ बेहतर शिक्षा और सुविधाओं की बात होती है, दूसरी तरफ एक ही कमरे में पांच कक्षाओं के बच्चों की पढ़ाई की मजबूरी सामने आती है। स्कूल भवन का निर्माण पांच साल तक अधूरा रहने के कारणों, निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी, अब तक हुए काम और खर्च की स्थिति तथा संबंधित विभाग की निगरानी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह केवल एक गांव के अधूरे स्कूल भवन का मामला नहीं है। यह उन बच्चों के शैक्षणिक माहौल का सवाल है, जिनके लिए स्कूल की बुनियादी सुविधा भी समय पर उपलब्ध नहीं हो पाई।
तूफानी मौसम में छात्र और अभिभावकों ने किया 15 किलोमीटर पैदल मार्च
बुधवार को जब चक्रवात और खराब मौसम को लेकर प्रशासन सतर्क था तथा स्कूलों में छुट्टी के आदेश जारी किए जा रहे थे, उसी दौरान ठेमली पथर्री के छात्र अपने अभिभावकों के साथ विरोध जताने निकल पड़े। हाथों में पोस्टर और बेहतर शिक्षा की उम्मीद लिए बच्चे व पालक करीब 15 किलोमीटर पैदल चलकर एसडीएम कार्यालय पहुंचे। यहां उन्होंने निर्माणाधीन स्कूल भवन की धीमी गति पर नाराजगी जताई और एसडीएम लोकांश एल्मा को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। अभिभावकों ने कहा कि जब शिकायतों और आवेदनों के बाद भी उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो अब उनके पास विरोध के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। पालकों ने घोषणा की कि स्कूल भवन का निर्माण पूरा होने तक वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे। यह फैसला बच्चों की पढ़ाई के लिहाज से भी चिंता पैदा करता है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से चली आ रही समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं।
सुशासन तिहार में आवेदन, फिर भी समाधान का इंतजार
सुशासन तिहार का उद्देश्य लोगों की समस्याओं को सुनना और उनका निराकरण सुनिश्चित करना है। लेकिन ठेमली पथर्री के अभिभावकों का दावा है कि उन्होंने इस मंच पर भी दो बार अपनी समस्या रखी, इसके बावजूद स्कूल भवन अधूरा है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आवेदन किस अधिकारी तक पहुंचा। असली सवाल यह है कि आवेदन के बाद क्या कार्रवाई हुई, निर्माण में देरी की समीक्षा किसने की और बच्चों को बेहतर शैक्षणिक सुविधा दिलाने के लिए समयबद्ध कदम क्यों नहीं उठाए गए ? किसी भी सरकारी व्यवस्था की सफलता का पैमाना सिर्फ योजनाओं की घोषणा, बैठकों और शिकायतों के पंजीयन से तय नहीं होना चाहिए। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि आम लोगों की समस्या कितने समय में हल हुई। ठेमली पथर्री का मामला इसी कसौटी पर व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता है।
पांच साल से अधूरे प्राथमिक शाला भवन को लेकर उठे इस विरोध ने शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के सामने कई सवाल रख दिए हैं। निर्माण की वर्तमान स्थिति क्या है ? काम पूरा करने की समय-सीमा क्या तय की गई है ? देरी के लिए कौन जिम्मेदार है ? और जब अभिभावक पहले ही कई बार शिकायत कर चुके थे, तो समस्या का समाधान समय रहते क्यों नहीं हुआ ? इन सवालों पर संबंधित विभाग और प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है। साथ ही, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था और भवन निर्माण पूरा करने की स्पष्ट समय-सीमा तय की जानी चाहिए। फिलहाल ठेमली पथर्री की की इस तस्वीर ने एक बार फिर सूबे की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी सिस्टम की उदासीनता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। अब देखना यह है कि अभिभावकों के शाला बहिष्कार के ऐलान के बाद व्यवस्था जागती है या बच्चों को अपने स्कूल के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा।


