रायपुर/दंतेवाड़ा 27 सितंबर 2026। बस्तर के बैलाडीला स्थित नंदराज पहाड़ के डिपॉजिट-13 में खनन को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। पर्यावरण कार्यकर्ता आलोक शुक्ला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर 6 मार्च 2020 को छत्तीसगढ़ वन विभाग की ओर से NMDC को जारी नोटिस साझा करते हुए वन स्वीकृति, ग्रामसभा की वैधता और मौजूदा खनन गतिविधियों को लेकर विष्णुदेव साय सरकार पर गंभीर सवाल उठाये है। सरकार के इस फैसले पर आलोक शुक्ला ने पूछा है कि….“जब 2019 में स्थानीय ग्रामीणों के विरोध के बाद ग्रामसभा की कार्यवाही की जांच हुई और दंतेवाड़ा प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर 2020 में वन विभाग ने डिपॉजिट-13 की स्टेज-2 वन स्वीकृति रद्द करने के लिए एनएमडीसी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था, तो इसके बाद वन स्वीकृति की स्थिति क्या रही और किस प्रक्रिया के तहत अब परियोजना में खनन गतिविधियां शुरू हुईं ?
गौरतलब है कि नंदराज पहाड़ के डिपॉजिट-13 को लेकर वर्ष 2019 में बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीणों ने विरोध किया था। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक 11 जून 2019 को दंतेवाड़ा जिला प्रशासन ने स्थानीय ग्रामीणों के विरोध और ग्रामसभा से जुड़े FRA प्रमाणपत्र की जांच की मांग के बीच डिपॉजिट-13 की परियोजना गतिविधियां रोकने का आदेश दिया था। इसके बाद हिरोली गांव में वर्ष 2014 में हुई ग्रामसभा की कार्यवाही की जांच कराई गई। 4 मार्च 2020 को दंतेवाड़ा कलेक्टर ने राज्य सरकार को रिपोर्ट भेजी थी। इसके बाद 6 मार्च 2020 को वन विभाग ने एनएमडीसी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था कि वन भूमि डायवर्जन से संबंधित स्वीकृति को रद्द क्यों न किया जाए।
बस्तर में आदिवासियों के पवित्र देव स्थल और बहुत ही समृद्ध जैव विविधता वाले नंदराज पहाड़ का भी भाजपा की साय सरकार विनाश कर रही है ।
सवाल यह कि नंदराज पहाड़ (13 नंबर डिपोजिट) का 2019 में भारी विरोध हुआ था और हिरोली गाँव की ग्रामसभा प्रस्ताव की जाँच के आदेश शासन ने दिए थे ।
कलेक्टर की जाँच रिपोर्ट में ग्रामसभा प्रस्ताव फर्जी पाए गए थे और कलेक्टर ने ही वन स्वीकृति शून्य घोषित करने की अनुशंसा की थी ।
इसके बाद 6 मार्च 2020 को वन विभाग ने NMDC को नोटिस जारी कर वन स्वीकृति निरस्त करने की प्रक्रिया चलाई थी
फिरबिना पुनः ग्रामसभा सहमति लिए यह वन स्वीकृति वैध कब हो गई और खनन किस आधार पर शुरू किया जा रहा है ?
क्या हसदेव से लेकर नंदराज पहाड़ के विनाश के ख़िलाफ़ विरोध को कुचलने ही प्रदेश में NSA लगाया गया है ??
@vishnudsai
@nmdclimited— Alok Shukla (@alokshuklacg) September 27, 2026
6 मार्च 2020 का वही नोटिस अब फिर चर्चा में
एनएमडीसी के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी दर्ज है कि 6 मार्च 2020 को छत्तीसगढ़ वन विभाग ने डिपॉजिट-13 की स्टेज-2 वन स्वीकृति रद्द करने के लिए शो-कॉज नोटिस जारी किया था। रिकॉर्ड के अनुसार, यह कार्रवाई दंतेवाड़ा जिला प्रशासन की उस रिपोर्ट के बाद हुई थी, जिसमें ग्रामसभा की कार्यवाही को निरस्त किए जाने का उल्लेख था। एनएमडीसी-सीएमडीसी ने इस नोटिस का जवाब भी वन विभाग को दिया था। यही दस्तावेज अब आलोक शुक्ला ने सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। आलोक शुक्ला का सवाल है कि 2020 में जिस वन स्वीकृति को रद्द करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, उसके बाद परियोजना की कानूनी और प्रशासनिक स्थिति क्या रही ? क्या इस बीच ग्रामसभा की प्रक्रिया दोबारा हुई? यदि हुई तो उसकी कार्यवाही क्या थी?
और मौजूदा खनन गतिविधियों के लिए वन स्वीकृति किस आधार पर प्रभावी हुई ? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एनएमडीसी के 2026 के रिकॉर्ड के अनुसार, 2 जून 2026 को डिपॉजिट-13 की Forest Clearance को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने NMDC-CMDC को ट्रांसफर किया। इसके बाद 13 जुलाई को संशोधित CA Land पर मंत्रालय की सहमति और 15 जुलाई 2026 को राज्य वन विभाग की ओर से Forest Land Diversion Order जारी होने का उल्लेख है। इसी रिकॉर्ड में 23 जुलाई 2026 से शुरुआती खनन गतिविधियां शुरू होने की जानकारी दी गई है। यानी 2020 के नोटिस से लेकर 2026 में वन स्वीकृति के ट्रांसफर और वन भूमि डायवर्जन तक की पूरी प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है।
नंदराज पहाड़ सिर्फ खनन का मुद्दा नहीं
डिपॉजिट-13 का मामला केवल लौह अयस्क खनन और वन भूमि का मामला नहीं रहा है। स्थानीय आदिवासी समुदाय लंबे समय से नंदराज पहाड़ को आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े स्थल के रूप में देखते हुए खनन का विरोध करता रहा है। वर्ष 2019 के आंदोलन में ग्रामीणों ने इसी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का हवाला दिया था। यही वजह है कि अब वन स्वीकृति की प्रक्रिया और ग्रामसभा की भूमिका को लेकर उठाए जा रहे सवाल केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आदिवासी अधिकार, पर्यावरण और स्थानीय सहमति से भी जुड़े हैं।
पर्यावरण नीति पर भी सवाल
आलोक शुक्ला ने अपने पोस्ट के जरिए सरकार की पर्यावरण नीति और उसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाया है। उनका सवाल मूल रूप से यह है कि जब किसी परियोजना की ग्रामसभा और वन स्वीकृति को लेकर सरकारी स्तर पर ही गंभीर आपत्तियां दर्ज हुई थीं, तो बाद की प्रक्रिया में उन आपत्तियों का समाधान कैसे हुआ ? दस्तावेजों में 2020 में वन स्वीकृति रद्द करने की प्रक्रिया और 2026 में Forest Clearance के NMDC-CMDC को ट्रांसफर होने की जानकारी मौजूद है। इसलिए पूरे मामले में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2020 के बाद कौन-कौन से आदेश जारी हुए, वन स्वीकृति की कानूनी स्थिति क्या रही और ग्रामसभा से संबंधित प्रक्रिया किस तरह पूरी की गई।
हसदेव के बाद नंदराज पहाड़ का मुद्दा भी गरमाया
छत्तीसगढ़ में खनन परियोजनाओं को लेकर पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की चिंता पहले भी सामने आती रही है। अब हसदेव के बाद नंदराज पहाड़ और डिपॉजिट-13 का मुद्दा भी राज्य की पर्यावरणीय नीति पर बहस का हिस्सा बनता दिख रहा है। आलोक शुक्ला ने अपने सवालों के जरिए सरकार से जवाब मांगा है कि 2020 में वन स्वीकृति रद्द करने की प्रक्रिया के बाद 2026 में उसी परियोजना को आगे बढ़ाने तक कौन-कौन से निर्णय लिए गए और उनकी पूरी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। अब निगाह सरकार, वन विभाग और परियोजना से जुड़े अधिकारियों के आधिकारिक जवाब पर है। खास तौर पर 6 मार्च 2020 के नोटिस के बाद की पूरी प्रक्रिया, ग्रामसभा की स्थिति और 2026 में वन स्वीकृति ट्रांसफर के आधार को सार्वजनिक किए जाने से इस विवाद से जुड़े कई सवालों का जवाब मिल सकता है।




