रायपुर 1 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। प्रदेश की सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक मुद्दों पर टकराव तो पुराना है, लेकिन अब प्रदेश प्रभारियों की नियुक्ति के साथ संगठन की सियासी लड़ाई सोशल मीडिया के पोस्टर, वीडियो और तंज तक पहुंच गई है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों दलों के नेता और पार्टी संगठन अब एक-दूसरे के प्रदेश प्रभारियों की घेराबंदी करते हुए राजनीतिक हमले तेज कर रहे हैं। कांग्रेस जहां स्मृति ईरानी को निशाने पर लेकर महंगाई और एलपीजी जैसे मुद्दे उठा रही है, वहीं भाजपा सुखदेव भगत के राजनीतिक अतीत को आधार बनाकर कांग्रेस और उसके नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रही है। इस तरह प्रदेश प्रभारी की नियुक्ति अब महज संगठनात्मक बदलाव तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि भाजपा-कांग्रेस के बीच नए सियासी नैरेटिव की लड़ाई का केंद्र बनती दिखाई दे रही है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हालत पहले से ही खस्ता है और अब विवादों में रहने वाले सुखदेव भगत को नया प्रभारी बना दिया गया है।
14 साल कांग्रेस में रहने के बाद सत्ता के लालच में भाजपा जाना, फिर धक्के खाकर लौटना और अपनी ही पार्टी में गुटबाज़ी फैलाना इनका पुराना रिकॉर्ड सब साफ करता है। ऐसे अवसरवादी नेतृत्व के भरोसे छत्तीसगढ़ कांग्रेस का अंत तय है।
— BJP Chhattisgarh (@BJP4CGState) October 1, 2026
गौरतलब है कि 23 सितंबर को भाजपा ने स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ का प्रदेश प्रभारी बनाया है, जबकि कांग्रेस ने सितंबर की शुरुआत में सांसद सुखदेव भगत को प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी है। यानी दोनों प्रमुख दलों के संगठन में नए चेहरों की एंट्री होने के साथ ही प्रदेश की राजनीति में नए नैरेटिव की जमीन तैयार होने लगी है। स्मृति ईरानी की नियुक्ति के बाद से ही कांग्रेस लगातार हमलावर बनी हुई है। कांग्रेस ने सोशल मीडिया के जरिए एक बार फिर स्मृति ईरानी को निशाने पर लिया। कांग्रेस की ओर से किए गए पोस्ट में महंगाई और एलपीजी सिलेंडर के पुराने राजनीतिक मुद्दे को उठाते हुए उन्हें ‘लापता लेडीज’ कहकर तंज किया गया। कांग्रेस के पोस्ट में यह सवाल भी उठाया गया कि जब सिलेंडर की कीमत 400 रुपये थी तब स्मृति ईरानी सड़क पर थीं, लेकिन अब महंगाई बढ़ने के बीच वे कहां हैं। यहां राजनीतिक संदेश साफ दिखाई देता है, कांग्रेस नई नियुक्ति को सिर्फ संगठनात्मक खबर के रूप में नहीं, बल्कि महंगाई और पुराने राजनीतिक बयानों से जोड़कर पेश कर रही है।
₹400 का सिलेंडर था तो स्मृति ईरानी सड़क पर थीं,
आज महंगाई आसमान पर है तो मैडम कहां गायब हैं..? https://t.co/QCsuqsoeQc— INC Chhattisgarh (@INCChhattisgarh) October 1, 2026
जवाब में भाजपा ने सुखदेव भगत को बनाया निशाना
कांग्रेस की ओर से स्मृति ईरानी पर किए गए हमले के बाद भाजपा भी पीछे नहीं रही। भाजपा ने कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी सुखदेव भगत को निशाने पर लेते हुए सोशल मीडिया पर तीखा हमला किया। भाजपा की ओर से किए गए पोस्ट में सुखदेव भगत को ‘अवसरवादी’ बताया गया और उनके पुराने राजनीतिक सफर का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा गया। भाजपा के पोस्ट में आरोप लगाया गया कि… “छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हालत पहले से ही खस्ता है और अब विवादों में रहने वाले सुखदेव भगत को नया प्रभारी बना दिया गया है। 14 साल कांग्रेस में रहने के बाद सत्ता के लालच में भाजपा जाना, फिर धक्के खाकर लौटना और अपनी ही पार्टी में गुटबाज़ी फैलाना इनका पुराना रिकॉर्ड सब साफ करता है। ऐसे अवसरवादी नेतृत्व के भरोसे छत्तीसगढ़ कांग्रेस का अंत तय है।”
दो नए प्रभारी, दो अलग चुनौतियां
छत्तीसगढ़ की मौजूदा राजनीति में दिलचस्प बात यह है कि दोनों दलों के नए प्रभारी ऐसे समय जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जब छत्तीसगढ़ की राजनीति में अगली विधानसभा चुनावी तैयारी की जमीन धीरे-धीरे तैयार हो रही है। कांग्रेस ने 6 सितंबर को सुखदेव भगत को प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया था। उन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने को प्राथमिकता बताया है। दूसरी तरफ लंबे समय से खाली प्रदेश प्रभारी की कमान भाजपा ने 23 सितंबर को स्मृति ईरानी के हाथों में सौंपा गया। इस लिहाज से दोनों नियुक्तियों का महत्व केवल पद और चेहरे बदलने तक सीमित नहीं है। प्रभारी की भूमिका संगठन के भीतर समन्वय, चुनावी तैयारी, स्थानीय नेतृत्व के साथ तालमेल और पार्टी के राजनीतिक संदेश को जमीन तक पहुंचाने के साथ ही पार्टी के भीतर व्याप्त असंतोष को समय रहते दूर कर ‘डैमेज कंट्रोल’ करना भी नए प्रदेश प्रभारी के लिए एक अहम चुनौती होगी।
पोस्टर वार के पीछे असली लड़ाई ‘नैरेटिव’ की
छत्तीसगढ़ में सोशल मीडिया पर चल रही यह तकरार एक बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर भी इशारा करती है। पहले राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी मुख्य रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस, सभाओं और पोस्टरों तक सीमित रहती थी। अब एक राजनीतिक पोस्ट कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। लिहाजा पोस्टर अब सिर्फ प्रचार सामग्री नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव बनाने का माध्यम बन चुका है। स्मृति ईरानी को लेकर कांग्रेस ने महंगाई और एलपीजी का मुद्दा उठाया, जबकि भाजपा ने सुखदेव भगत के राजनीतिक अतीत को केंद्र में रखकर कांग्रेस नेतृत्व पर हमला किया। यानी दोनों दल अपने-अपने लिए ऐसे मुद्दे तलाश रहे हैं जिनसे विरोधी दल के नए प्रभारी की राजनीतिक छवि पर सवाल खड़ा किया जा सके।
वीडियो और पोस्टर की राजनीति बनाम जमीनी राजनीति
छत्तीसगढ़ में राजनीतिक मुकाबला सिर्फ राजधानी रायपुर तक सीमित नहीं है। प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों से लेकर औद्योगिक इलाकों तक अलग-अलग मुद्दे हैं। रोजगार, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, आदिवासी क्षेत्र, खनन, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा बने रहेंगे। ऐसे में सोशल मीडिया पर चलने वाला पोस्टर या वीडियो तत्काल राजनीतिक चर्चा तो पैदा कर सकता है, लेकिन उसकी वास्तविक राजनीतिक अहमियत इस बात से तय होगी कि पार्टियां इन नैरेटिव को बूथ और जनता के बीच किस तरह के संगठनात्मक अभियान में बदलती हैं।
छत्तीसगढ़ में अभी विधानसभा चुनाव सामने नहीं है, लेकिन दोनों दलों की संगठनात्मक गतिविधियों और नए प्रभारियों की नियुक्तियों ने राजनीतिक तैयारियों को चर्चा में ला दिया है। एक तरफ भाजपा सत्ता में रहते हुए अपने संगठन और सरकार के संदेश को जनता तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने विपक्ष की भूमिका के साथ अपने संगठन को मजबूत करने की चुनौती है। ऐसे में स्मृति ईरानी और सुखदेव भगत के बीच सीधे तौर पर कोई राजनीतिक मुकाबला नहीं है, लेकिन दोनों की नियुक्तियां आने वाले समय में भाजपा और कांग्रेस की संगठनात्मक रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखी जा रही हैं।


