कोरबा 21 जून 2026। एसईसीएल की कुसमुंडा खदान में एक बार फिर बड़ा हादसा हुआ है। शनिवार देर रात मिट्टी अनलोडिंग के दौरान एक डंफर करीब 150 फीट गहरी खाई में गिर गया। जिसमें ऑपरेटर सत्य नारायण की मौत हो गई। चिंताजनक बात यह है कि यह हादसा ऐसे समय हुआ है जब एक दिन पहले ही ट्रेलर की चपेट में आने से एक चालक की जान जा चुकी है। एसईसीएल की खदानों में लगातार हो रही दुर्घटनाओं ने खदानों में सुरक्षा प्रबंधन और कार्यस्थल की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक एसईसीएल के विभागीय कर्मी सत्य नारायण शनिवार कुसमुंडा परियोजना में डंफर आपरेटर के पद पर कार्यरत थे। बताया जा रहा है कि शनिवार की रात वह नाइट शिफ्ट ड्यूटी पर खदान पहुंचे थे। देर रात करीब 1 बजे कुसमुंडा खदान के खोडरी फेस में डंफर से मिट्टी अनलोड का काम किया जा रहा था। इसी दौरान सत्य नारायण का डंफर अचानक डंपिंग की उचाई से पीछे की ओर फिसल गया और लगभग 150 फीट नीचे खाई में जा गिरा। हादसे में ऑपरेटर गंभीर रूप से घायल हो गया। उधर इस घटना की सूचना मिलते ही बचाव दल और एंबुलेंस मौके पर पहुंची, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही एसईसीएल कर्मी की मौत हो गई।
हादसा या लापरवाही ?
कुसमुंडा परियोजना देश की सबसे बड़ी ओपन कास्ट खदानों में गिनी जाती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या डंपिंग पॉइंट पर सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा था ? क्या पर्याप्त सुरक्षा बैरियर मौजूद थे ? क्या रात की शिफ्ट में निगरानी व्यवस्था प्रभावी थी ? हर बड़े हादसे के बाद जांच के आदेश और मुआवजे की घोषणा तो होती है, लेकिन क्या हादसों के कारणों को खत्म करने के लिए भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाती है ?
एक के बाद एक हादसे, जवाबदेह कौन ?
कर्मचारियों और श्रमिक संगठनों का कहना है कि खदान में लगातार हो रही दुर्घटनाएं केवल संयोग नहीं हो सकतीं। यदि सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त है, तो फिर बार-बार जानलेवा हादसे क्यों हो रहे हैं । ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में सुरक्षा पीछे छूट रही है ? क्या हर हादसे के बाद सिर्फ जांच के आदेश जारी होंगे ? या फिर जिम्मेदारी भी तय की जाएगी ?
और सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर एसईसीएल की खदानों में मौतों का यह सिलसिला कब थमेगा ? ये वे सवाल हैं जिन्होंने एसईसीएल प्रबंधन की सुरक्षा व्यवस्था और डीजीएमएस (DGMS) के निरीक्षण तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। लगातार हो रहे हादसे इस आशंका को भी बल दे रहे हैं कि कहीं सुरक्षा मानकों की निगरानी और निरीक्षण महज खानापूर्ति तक तो सीमित नहीं रह गए हैं।

