जांजगीर 28 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ में किसानों की जमीन और फसल का डिजिटल सर्वे करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे PV ऐप की कथित तकनीकी गड़बड़ियों ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। मामला ऐसा है कि किसान की जमीन का नक्शा छत्तीसगढ़ में रहने के बजाय सीधे अटलांटिक महासागर तक पहुंच गया ! अब इसे तकनीक का कमाल कहें या डिजिटल सर्वे की ऐसी उड़ान, जिसमें खेत ने ही राज्य की सीमा पार कर ली। जांजगीर के खसरा नंबर 334-4 के पालीगान नक्शे को लेकर दावा किया जा रहा है कि वह ऑनलाइन रिकॉर्ड में छत्तीसगढ़ से हजारों किलोमीटर दूर अटलांटिक महासागर तक पहुंचा हुआ दिखाई दे रहा है। यानी किसान खेत में फसल उगाए और डिजिटल नक्शा समंदर में अपनी लोकेशन तलाशता नजर आए !
गौरतलब है कि डिजिटल सर्वे का मकसद जमीन और फसल का सटीक रिकॉर्ड तैयार करना है, ताकि किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में आसानी हो। लेकिन जांजगीर में सामने आई शिकायतें इस व्यवस्था की सटीकता पर ही सवाल खड़े कर रही हैं। कहीं खेत का नक्शा बिंदु बनकर रह गया, तो कहीं उसकी शक्ल सीधी लकीर जैसी दिखाई देने की शिकायत है। अब खसरा नंबर 334-4 का नक्शा महासागर तक पहुंचने का दावा सामने आया है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब खेत का डिजिटल पता ही बदल जाए, तो रिकॉर्ड की सटीकता पर भरोसा कैसे किया जाए ? मामला केवल नक्शे की लोकेशन तक सीमित नहीं है। कुछ किसानों की कृषि भूमि को PV ऐप में आवासीय श्रेणी में दर्ज किए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। अगर रिकॉर्ड में ऐसी गलतियां बनी रहती हैं, तो भविष्य में गिरदावरी, धान खरीदी पंजीयन, फसल बीमा और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में किसानों को परेशानी हो सकती है।
सवाल यह है कि जमीन की श्रेणी दर्ज करते समय सत्यापन की व्यवस्था कितनी मजबूत थी? और अगर गलती हुई, तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी किसकी होगी ? इस पूरे मामले में ऑनलाइन पोर्टल से पालीगान मैप देखने का विकल्प हटने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि पहले नक्शे दिखाई देते थे, लेकिन बाद में यह विकल्प उपलब्ध नहीं रहा। हालांकि, पोर्टल में बदलाव की वजह की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अब सवाल यह है कि क्या तकनीकी समस्या को सुधारने के लिए बदलाव किया गया है, या इसके पीछे कोई दूसरी वजह है? विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि पोर्टल पर नक्शे की सुविधा की मौजूदा स्थिति क्या है और कथित गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
दस रुपये प्रति सर्वे और लक्ष्य का दबाव !
सर्वे कार्य में लगे कर्मचारियों पर प्रतिदिन निर्धारित लक्ष्य पूरा करने का दबाव होने के आरोप भी सामने आए हैं। सूत्रों के हवाले से प्रति सर्वे दस रुपये भुगतान की बात कही जा रही है। हालांकि, भुगतान की शर्तों और दबाव से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। यदि कम समय में अधिक सर्वे पूरा करने का दबाव था, तो यह भी जांच का विषय है कि कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और सत्यापन का समय मिला या नहीं। आखिर डिजिटल सर्वे का उद्देश्य रिकॉर्ड को दुरुस्त करना है, न कि जल्दबाजी में ऐसी प्रविष्टियां तैयार करना जिनकी लोकेशन ही सवालों के घेरे में आ जाए। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यहीं कि….यदि डिजिटल इंडिया में किसान की जमीन का नक्शा अगर महासागर तक पहुंचने का दावा झेल रहा है, तो अब तकनीक के साथ-साथ निगरानी व्यवस्था की भी परीक्षा होनी चाहिए। क्योंकि किसान को अपनी जमीन का सही रिकॉर्ड चाहिए—ऐसा नक्शा नहीं, जिसे देखकर खेत की तलाश जमीन पर कम और समंदर में ज्यादा करनी पड़े।


