रायपुर 3 नवंबर 2026। छत्तीसगढ़ में औद्योगिक विकास की दौड़ के बीच एक बार फिर पर्यावरण और जल संरक्षण का सवाल खड़ा हो गया है। रायपुर जिले के तिल्दा क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक पेंड्रावन जलाशय पर लाइम स्टोन खनन का खतरा मंडरा रहा है। अल्ट्राटेक सीमेंट की करीब 689 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित खनन परियोजना को जल संसाधन विभाग से दोबारा अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) मिलने के बाद स्थानीय किसानों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में नाराजगी है। आशंका जताई जा रही है कि जलाशय के कैचमेंट क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन से पानी की आवक, भूजल पुनर्भरण और सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
पर्यावरण कार्यकर्ता आलोक शुक्ला ने इस फैसले पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने सरकार की औद्योगिक नीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ में विकास और निवेश के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनका कहना है कि जिस जलाशय को बचाने के लिए वर्ष 2017 में किसानों के व्यापक आंदोलन के बाद तत्कालीन सरकार को खनन परियोजना की NOC निरस्त करनी पड़ी थी, उसी परियोजना को फिर अनुमति देना पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। आपको बता दे पेंड्रावन जलाशय और खनन परियोजना का विवाद करीब एक दशक पुराना है। वर्ष 2017 में अल्ट्राटेक की लाइम स्टोन खनन परियोजना के लिए जल संसाधन विभाग ने NOC जारी की थी।
इसके बाद स्थानीय किसानों ने विरोध शुरू कर दिया था। किसानों की आपत्तियों और जलाशय के कैचमेंट क्षेत्र पर संभावित प्रभाव को देखते हुए तत्कालीन जल संसाधन मंत्री ब्रजमोहन अग्रवाल ने NOC निरस्त करने का फैसला लिया था। उस समय सरकार की ओर से सिंचाई के हितों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी। हालांकि, कंपनी ने NOC निरस्त करने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। 25 अप्रैल 2024 को हाईकोर्ट ने निरस्तीकरण आदेश को रद्द करते हुए जल संसाधन विभाग को कंपनी का पक्ष सुनकर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया था। इसके बाद उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर विभाग ने दोबारा NOC जारी की। इसी फैसले के बाद क्षेत्र में विरोध फिर तेज हो गया है।
खनन से सिर्फ जलाशय नहीं, पूरे जल तंत्र पर पड़ सकता है असर
पेंड्रावन जलाशय की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि इससे करीब 3440 किसानों की 2440 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई जुड़ी हुई बताई जाती है। आसपास के गांवों के लिए भी यह जलाशय महत्वपूर्ण जलस्रोत है। इसके अलावा बारिश के पानी को जलाशय तक पहुंचाने वाले प्राकृतिक नाले और जलप्रवाह क्षेत्र भूजल पुनर्भरण में भूमिका निभाते हैं। खनन परियोजना को लेकर पर्यावरण संबंधी चिंता का एक महत्वपूर्ण पहलू जमीन के भीतर मौजूद पानी भी है। परियोजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट के कार्यकारी सारांश में प्री-मानसून के दौरान भूजल स्तर 10 से 15 मीटर और पोस्ट-मानसून में 5 से 7 मीटर नीचे दर्ज किया गया है।
वहीं, प्रस्तावित खदान की अंतिम गहराई लगभग 30 मीटर तक बताई गई है। यानी खनन की प्रस्तावित गहराई भूजल स्तर तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में भी उल्लेख है कि खनन के दौरान भूजल स्तर प्रभावित होने की स्थिति बन सकती है और इसके लिए संबंधित विभाग से अनुमति लेनी होगी। यही वह बिंदु है, जिसने पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ाई है। खुले क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खुदाई, ब्लास्टिंग, भारी मशीनों और खनिज परिवहन से धूल और शोर प्रदूषण का खतरा रहता है। यदि प्राकृतिक जलप्रवाह के रास्ते प्रभावित होते हैं, तो बारिश का पानी पहले की तरह जलाशय तक पहुंचने में बाधित हो सकता है। इससे जलाशय की जल संग्रहण क्षमता, सिंचाई और आसपास के भूजल स्रोतों पर असर पड़ने की आशंका है।
आलोक शुक्ला ने उठाए सरकार की औद्योगिक नीति पर सवाल
पर्यावरण कार्यकर्ता आलोक शुक्ला ने पेंड्रावन मामले को केवल एक खनन परियोजना की अनुमति का मामला नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधनों के भविष्य से जुड़ा सवाल बताया है। उन्होंने हसदेव अरण्य, नंदराज और पेंड्रावन जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया है कि सरकारें बदलने के बावजूद औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर स्थानीय समुदायों और पर्यावरण के हितों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उनका सवाल है कि क्या औद्योगिक निवेश और कंपनियों की जरूरतें इतनी महत्वपूर्ण हो गई हैं कि जलाशयों, जंगलों और किसानों की आजीविका से जुड़े सवाल पीछे छूट जाएं ?
उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की विष्णुदेव साय सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल बड़े औद्योगिक घरानों के हित में किया जा रहा है। आलोक शुक्ला ने चिंता जताते हुए कहा है कि प्राकृतिक संसाधनों को केवल खनिज संपदा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जलाशय, जंगल, नदी और भूजल किसी भी क्षेत्र की पारिस्थितिकी और स्थानीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद होते हैं। एक बार प्राकृतिक जलप्रवाह और भूजल व्यवस्था में गंभीर बदलाव आ जाए तो उसकी भरपाई करना आसान नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ NOC जारी होने के बाद बरौंदा, बंगोली और कुर्रा सहित आसपास के गांवों में ग्रामीणों ने सभाएं कर खनन परियोजना का विरोध किया है।
पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस फैसले के खिलाफ आंदोलन तेज करने की बात कही है। ग्रामीणों ने जल संसाधन विभाग के तिल्दा कार्यालय का घेराव करने की रणनीति भी बनाई है। गौरतलब है कि पेंड्रावन का मामला छत्तीसगढ़ की विकास नीति के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। एक तरफ राज्य में औद्योगिक निवेश, सीमेंट उत्पादन और खनिज आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ ऐसे उद्योगों के लिए प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध सामने आ रहा है। यहां सवाल उद्योगों के विरोध या विकास को रोकने का नहीं, बल्कि विकास की शर्तों का है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यहीं कि….क्या खनन से पहले जलाशय के पूरे कैचमेंट क्षेत्र, प्राकृतिक जलप्रवाह, भूजल स्तर और किसानों की सिंचाई पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का स्वतंत्र और पारदर्शी आकलन किया गया है ? क्या इन रिपोर्टों और तकनीकी निष्कर्षों को सार्वजनिक किया गया है ? और क्या प्रभावित गांवों के लोगों की चिंताओं का समाधान किया गया है ? पेंड्रावन जलाशय का भविष्य इन सवालों के जवाब से जुड़ा है। यदि खनन परियोजना आगे बढ़ती है, तो उसके पर्यावरणीय प्रभावों की निगरानी और जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए ठोस जवाबदेही जरूरी होगी। क्योंकि खनिज भंडार का दोहन एक औद्योगिक जरूरत हो सकता है, लेकिन पानी और खेती का संकट हजारों परिवारों के जीवन को प्रभावित कर सकता है।

