नई दिल्ली/हैदराबाद 4 अक्टूबर 2026। देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइयां की टिप्पणी ने नई बहस छेड़ दी है। हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में रविवार को एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से मनमानी होगी। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता—एक ऐसा वर्ग जिसके पास मतदान का अधिकार हो और दूसरा ऐसा वर्ग जिसके पास यह अधिकार न हो। उनके मुताबिक लाखों नागरिकों को उनके ही देश में बिना मतदान के अधिकार के छोड़ देना उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा होगा।
जस्टिस भुइयां ने मतदान के अधिकार और मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को नागरिकता से अलग नहीं किए जाने की बात कही। उन्होंने इसकी तुलना शरीर से आत्मा अलग करने से की। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा है। अनुच्छेद 326 के तहत 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के भारतीय नागरिकों को निर्धारित संवैधानिक अयोग्यताओं को छोड़कर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार है। जस्टिस भुइयां ने यह भी कहा कि वोट देने का अधिकार भले ही मौलिक अधिकार के रूप में नहीं माना गया हो, लेकिन यह संविधान से निकला संवैधानिक अधिकार है और अनुच्छेद 326 के जरिए इसे आधार मिलता है। उन्होंने कहा कि कानून इस अधिकार के इस्तेमाल को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन कोई भी प्रशासनिक प्रक्रिया संवैधानिक सीमाओं से बाहर नहीं जा सकती।
‘कोई बहाना मताधिकार छीनने को सही नहीं ठहरा सकता’
जस्टिस भुइयां ने बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने की स्थिति पर कहा कि ऐसी प्रक्रिया को केवल अलग-अलग तर्क देकर सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि अगर लाखों नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जाता है तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 के खिलाफ होगा और संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना पर असर डालेगा। उन्होंने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और संविधान निर्माण की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा। उनके मुताबिक लोकतंत्र में नागरिक की सामाजिक या आर्थिक स्थिति चाहे जो हो, मतदान के जरिए शासन में उसकी आवाज बराबर रहती है। जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है।
हालांकि जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में SIR या चुनाव आयोग का सीधे नाम नहीं लिया। उनकी टिप्पणी व्यापक संवैधानिक सिद्धांतों और मताधिकार से जुड़ी थी। लेकिन मौजूदा SIR विवाद की पृष्ठभूमि में इस बयान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गौरतलब है कि मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग के इस तरह का विशेष पुनरीक्षण कराने के अधिकार को बरकरार रखा था। अदालत ने कहा था कि मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक उद्देश्य से जुड़ी है। यानी मौजूदा बहस में दो महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू सामने हैं—एक तरफ साफ और विश्वसनीय मतदाता सूची, और दूसरी तरफ पात्र नागरिक का मतदाता सूची से बाहर न होना।
चुनाव आयोग के भीतर 14 आपत्तियों की रिपोर्ट से भी विवाद गरम
SIR को लेकर विवाद उस समय और बढ़ गया जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की।रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, Form-6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अपनी जानकारी या सहमति के बिना जारी किए जाने पर सवाल उठाए।
चुनाव आयोग का जवाब भी सामने आया
इन रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि आयोग के सभी फैसले, जिसमें SIR भी शामिल है, तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। EC के मुताबिक किसी भी संस्थान में आंतरिक चर्चा के दौरान अलग-अलग राय या टिप्पणियां होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने यह भी कहा कि उसके आदेशों को पूरा कानूनी समर्थन हासिल है और वे स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत जारी किए गए हैं। इस तरह विवाद का एक पक्ष यह है कि दो चुनाव आयुक्तों ने कई मुद्दों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
जयराम रमेश ने CEC ज्ञानेश कुमार पर साधा निशाना
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी सामने आने के बाद कांग्रेस ने इसे चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने हमले से जोड़ दिया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि CEC ने संविधान की भावना और प्रावधानों का उल्लंघन किया है। उन्होंने दावा किया कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी के बाद ज्ञानेश कुमार के पद पर बने रहने के नैतिक अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रमेश ने यहां तक कहा कि ज्ञानेश कुमार ने संविधान का उल्लंघन किया है और उनके पास अब पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है, जस्टिस भुइयां की ओर से CEC के खिलाफ दिया गया कोई सीधा निष्कर्ष नहीं।


