रायपुर 15 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और वित्तीय प्रबंधन को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा निष्पादन लेखा परीक्षा रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नौकरशाही की सुस्ती, कमजोर निगरानी और नियमों की अनदेखी के कारण मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी ग्रामीण रोजगार योजना अपने उद्देश्य से काफी पीछे रह गई। वहीं दूसरी ओर राज्य पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता गया और सरकार विकास योजनाओं के लिए आवंटित बजट तक खर्च नहीं कर सकी।
CAG की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच छत्तीसगढ़ में मनरेगा के तहत 18.26 लाख परिवार रोजगार पाने से वंचित रह गए। वहीं जिन परिवारों को काम मिला, उनमें भी करीब 83 प्रतिशत को कानून के तहत निर्धारित 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जा सका। रिपोर्ट के ये आंकड़े ग्रामीण परिवारों को रोजगार की गारंटी देने के उद्देश्य से शुरू की गई मनरेगा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
ग्राम सभा की मंजूरी के बिना शुरू हुए अधिकांश काम
मनरेगा के तहत किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले ग्राम सभा की मंजूरी अनिवार्य होती है, लेकिन CAG की रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 86 फीसदी कार्य बिना ग्राम सभा की स्वीकृति के ही शुरू कर दिए गए। इससे योजना की पारदर्शिता और स्थानीय भागीदारी दोनों पर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कर्मचारियों के 29.62 करोड़ रुपये के भविष्य निधि (PF) अंशदान समय पर जमा नहीं किए गए। इसके अलावा श्रम बजट भी ग्रामीण परिवारों का सर्वे किए बिना तैयार किया गया, जिससे वास्तविक जरूरतों के अनुरूप रोजगार सृजन नहीं हो सका।
मानव संसाधनों की कमी ने बढ़ाई मुश्किलें
CAG ने योजना के कमजोर क्रियान्वयन के पीछे प्रशासनिक ढांचे की कमियों को भी जिम्मेदार ठहराया है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में मनरेगा से जुड़े करीब 21 फीसदी पद खाली थे। तकनीकी सहायकों और ग्राम रोजगार सहायकों की कमी का असर कार्यों की निगरानी और गुणवत्ता पर पड़ा। इतना ही नहीं, प्रशिक्षण और क्षमता विकास कार्यक्रमों में भी लक्ष्य के मुकाबले 97 फीसदी की कमी दर्ज की गई। इससे योजना के प्रभावी संचालन पर प्रतिकूल असर पड़ा।
योजनाएं बनीं, लेकिन खर्च नहीं हुआ बजट
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सरकार ने 25 नई योजनाओं के लिए 261.41 करोड़ रुपये का प्रावधान तो किया, लेकिन पूरे वित्तीय वर्ष में एक रुपये भी खर्च नहीं किए गए। CAG ने इसे प्रशासनिक स्तर पर गंभीर निष्क्रियता और योजना क्रियान्वयन में कमजोरी का संकेत माना है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य स्तर की वैधानिक समितियों की नियमित बैठकें भी नहीं हुईं और सामाजिक अंकेक्षण में उठाई गई आधे से अधिक आपत्तियों का अब तक निराकरण नहीं हो पाया।
रिपोर्ट के मुताबिक राज्य का सकल घरेलू उत्पाद बढ़ा है, लेकिन इसके साथ लोक ऋण बढ़कर 33,463 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। चिंताजनक बात यह है कि सरकार द्वारा लिए गए कुल उधार का करीब 47 फीसदी हिस्सा पुराने कर्ज चुकाने में खर्च हो गया, जबकि विकास कार्यों के लिए केवल 53 फीसदी राशि ही उपलब्ध रही। रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि राज्य की राजस्व प्राप्तियों का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है, जिससे भविष्य में वित्तीय दबाव और बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में क्या उभरकर आया ?
CAG की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि समस्या केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रशासनिक सुस्ती, कमजोर निगरानी और जवाबदेही की कमी भी है। मनरेगा में रोजगार उपलब्ध कराने से लेकर ग्राम सभा की मंजूरी, श्रम बजट तैयार करने, कर्मचारियों के PF जमा करने और योजनाओं के लिए आवंटित बजट खर्च करने तक कई स्तरों पर अनियमितताएं सामने आई हैं।रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब सरकार ग्रामीण विकास, रोजगार और सुशासन को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल होने का दावा करती रही है। ऐसे में CAG की टिप्पणियां प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

