कोरबा 14 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सफर करने वाले यात्रियों की सुरक्षा और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कोरबा जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग-130 पर दो ट्रक-ट्रेलरों की भिड़ंत के बाद करीब नौ घंटे तक यातायात बाधित रहने की घटना ने हाईवे के ऑपरेशन और मेंटेनेंस (O&M) का जिम्मा संभालने वाली एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। हैरानी की बात यह है कि दुर्घटना के बाद जब पुलिस को जाम खुलवाने और फंसे हुए यात्रियों को राहत दिलाने के लिए अपेक्षित सहयोग नहीं मिला, तब पुलिस ने NHAI के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कटघोरा न्यायालय में परिवाद दायर किया। इसके बाद NHAI हरकत में आया और जांच में लापरवाही सामने आने पर संबंधित ऑपरेशन एवं मेंटेनेंस एजेंसी पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।
NHAI की यह कार्रवाई भले ही जवाबदेही तय करने की दिशा में एक कदम हो, लेकिन इस घटना ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या राष्ट्रीय राजमार्गों पर तैनात एजेंसियां केवल टोल और रखरखाव तक सीमित हैं, या फिर किसी बड़े हादसे के वक्त यात्रियों को समय पर राहत पहुंचाना भी उनकी जिम्मेदारी है ? दरअसल ये पूरा मामला 12 अक्टूबर की देर रात करीब 2:30 से 3 बजे के बीच का बताया जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग-130 पर मोरगा के पास, चोटिया टोल प्लाजा के नजदीक दो ट्रक-ट्रेलरों की भिड़ंत के बाद सड़क पर यातायात बाधित हो गया। दुर्घटनाग्रस्त वाहनों को हटाने में देरी के कारण जाम लंबा खिंचता चला गया और करीब नौ घंटे तक मार्ग पर आवागमन प्रभावित रहा। इस दौरान बसों में सफर कर रहे यात्रियों, बीमार लोगों और निर्धारित समय पर ट्रेन या हवाई यात्रा के लिए निकलने वाले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा।
महिलाओं और बच्चों के भी घंटों फंसे रहने की स्थिति बनी। जाम खुलवाने के लिए थाना बांगो और मोरगा चौकी की पुलिस के साथ हाईवे पेट्रोलिंग तथा 112 की टीम ने प्रयास किए। पुलिस का आरोप है कि NHAI के अधिकारियों और संबंधित एजेंसी से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। इसके बाद पुलिस ने NHAI के जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध लोक सेवक के कर्तव्य में सहायता नहीं करने के आरोप में धारा 222(ए) बीएनएस के तहत कटघोरा न्यायालय में परिवाद दायर किया। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद NHAI ने मामले की जांच कराई और संबंधित एजेंसी पर 10 लाख रुपये का जुर्माना ठोका है।
क्रेन ऑपरेटर नहीं, उपकरणों के लिए पर्याप्त ईंधन भी नहीं
NHAI की जांच में सामने आई खामियां हाईवे पर आपातकालीन व्यवस्थाओं की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार दुर्घटना के दौरान एजेंसी का परियोजना प्रबंधक मौके पर मौजूद नहीं था। क्रेन ऑपरेटर की अनुपलब्धता और रिकवरी उपकरणों के लिए पर्याप्त ईंधन नहीं होने से दुर्घटनाग्रस्त वाहनों को हटाने का काम प्रभावित हुआ। इतना ही नहीं, 1033 हेल्पलाइन पर बार-बार सूचना दिए जाने के बावजूद समय पर आवश्यक सहायता नहीं मिल सकी। एनएचएआई ने इन खामियों को घटना प्रबंधन और हाईवे पेट्रोलिंग के निर्धारित मानकों का उल्लंघन माना।
इसके बाद ऑपरेशन और मेंटेनेंस का काम संभालने वाली एजेंसी पर 10 लाख रुपये की पेनल्टी लगाई गई। यहां सवाल सिर्फ एक दुर्घटना के बाद वाहन हटाने में हुई देरी का नहीं है। सवाल यह भी है कि यदि किसी हाईवे पर क्रेन ऑपरेटर उपलब्ध नहीं है, रिकवरी उपकरणों के लिए पर्याप्त ईंधन नहीं है और जिम्मेदार अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं हैं, तो आपात स्थिति से निपटने की तैयारियों की निगरानी आखिर कौन कर रहा है?
टोल और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी, लेकिन संकट में यात्री बेहाल क्यों?
राष्ट्रीय राजमार्गों पर ऑपरेशन और मेंटेनेंस एजेंसियों की जिम्मेदारी सड़क के रखरखाव तक ही सीमित नहीं होती। निर्धारित अनुबंध और मानकों के अनुसार हाईवे पेट्रोलिंग, दुर्घटना के बाद समन्वय और आवश्यक रिकवरी व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है। ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि दुर्घटना होने पर यातायात को जल्द सामान्य किया जा सके और यात्रियों की परेशानी कम हो। लेकिन कोरबा की घटना में सामने आई खामियां बताती हैं कि कागजों पर निर्धारित व्यवस्थाओं और जमीन पर उनकी उपलब्धता के बीच अंतर हो सकता है।
यदि दुर्घटनाग्रस्त वाहनों को हटाने के लिए जरूरी संसाधन समय पर उपलब्ध नहीं होते, तो उसका सीधा असर हजारों यात्रियों की आवाजाही पर पड़ सकता है। एंबुलेंस या गंभीर मरीजों के फंसने की स्थिति में देरी के परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं। ऐसे में यह जांचना जरूरी है कि संबंधित एजेंसी के पास निर्धारित संसाधन वास्तव में उपलब्ध थे या नहीं, उनकी नियमित जांच कैसे होती थी और हेल्पलाइन पर शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई में देरी क्यों हुई।
पुलिस की कार्रवाई के बाद ही क्यों जागा विभाग ?
इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू NHAI की कार्रवाई का समय है। पुलिस को जाम खुलवाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी, संबंधित अधिकारियों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने का आरोप लगा और अंततः मामला न्यायालय तक पहुंचा। इसके बाद एजेंसी पर आर्थिक दंड लगाया गया। इस घटनाक्रम से NHAI की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं। क्या संबंधित एजेंसी की तैयारियों की नियमित समीक्षा की जा रही थी ? क्या क्रेन, रिकवरी उपकरणों, ईंधन और प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता की जांच पहले से हो रही थी ? और यदि व्यवस्था में कमियां थीं, तो दुर्घटना से पहले उन्हें दूर क्यों नहीं किया गया ?
10 लाख रुपये का जुर्माना एक कार्रवाई जरूर है, लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं बनेगी। इसके लिए जरूरी है कि एजेंसी की जवाबदेही तय हो, कमियों को दूर करने की समयसीमा निर्धारित की जाए और आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता की नियमित निगरानी हो। कोरबा की यह घटना राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रियों की सुरक्षा, आपातकालीन सेवाओं और निजी एजेंसियों की जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करती है।


