नई दिल्ली: कैंसर के महंगे इलाज के बीच केंद्र सरकार ने मरीजों को बड़ी राहत देने वाला फैसला लिया है। सरकार ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सभी गैर-अनुसूचित दवाओं (Non-Scheduled Medicines) पर व्यापारियों के मार्जिन को अधिकतम एमआरपी का 30 फीसदी तक सीमित करने का फैसला किया है। इसमें देश में निर्मित ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं के साथ विदेश से आयातित पेटेंट और गैर-पेटेंट दवाएं भी शामिल होंगी। सरकार का अनुमान है कि इस फैसले से मरीजों और उनके परिवारों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है। सरकार के मुताबिक, इससे कैंसर के इलाज की लागत में बड़ी कमी आने की उम्मीद है और महंगे इलाज का आर्थिक बोझ मरीजों पर कुछ हद तक कम होगा।
सरकार का कहना है कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य कैंसर की दवाओं की खुदरा कीमतों में व्यापारियों द्वारा लिए जाने वाले अधिक मार्जिन को नियंत्रित करना है। मार्जिन सीमित होने से जरूरी और जीवन रक्षक दवाएं मरीजों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर मिल सकेंगी। साथ ही सरकार का जोर इस बात पर है कि कीमतों में कमी के बावजूद बाजार में दवाओं की उपलब्धता बनी रहे और मरीजों को जरूरी उपचार के लिए दवाओं की कमी का सामना न करना पड़े।
2019 में भी सरकार ने उठाया था ऐसा कदम
कैंसर की दवाओं की कीमत कम करने के लिए सरकार इससे पहले भी कदम उठा चुकी है। साल 2019 में सरकार के हस्तक्षेप के बाद 526 ब्रांड की दवाओं पर करीब 984 करोड़ रुपये की सालाना बचत होने की जानकारी सामने आई थी। अब गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन को 30 फीसदी तक सीमित करने के फैसले को इसी दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।
क्या होती हैं नॉन-शेड्यूल दवाएं ?
दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर यानी DPCO, 2013 लागू है। इसके तहत जरूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची यानी NLEM (National List of Essential Medicines) को DPCO की अनुसूची-I में शामिल किया गया है। कैंसर रोधी दवाएं DPCO, 2013 की अनुसूची-I के सेक्शन-7 में शामिल हैं। इस सूची में कैंसर के इलाज, इम्यूनोसप्रेसिव और पैलिएटिव केयर में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं। अनुसूची-I में शामिल दवाओं को शेड्यूल्ड दवाएं कहा जाता है, जबकि जो दवाएं इस सूची में शामिल नहीं हैं, उन्हें नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं कहा जाता है।
131 एंटी-कैंसर दवाओं की कीमत पहले से नियंत्रित
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी NPPA ने अनुसूची-I में शामिल 131 एंटी-कैंसर शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमतें निर्धारित की हैं। इन दवाओं के निर्माताओं को NPPA द्वारा निर्धारित अधिकतम कीमत और लागू GST के दायरे में ही अपना उत्पाद बेचना होता है। इसके अलावा DPCO के तहत आने वाली नई दवाओं की खुदरा कीमत भी NPPA द्वारा तय की जाती है। सरकार के अनुसार, 27 जनवरी तक एंटी-कैंसर चिकित्सा श्रेणी में 54 दवाओं की रिटेल कीमतें NPPA द्वारा निर्धारित की जा चुकी थीं।
कैंसर का इलाज लंबे समय तक चलने वाला और महंगा होता है। ऐसे में दवाओं की कीमत में कमी सीधे मरीजों के इलाज के खर्च को प्रभावित कर सकती है। सरकार का अनुमान है कि नए फैसले से मरीजों को करीब 2,500 करोड़ रुपये की राहत मिल सकती है। अब देखना होगा कि 30 फीसदी मार्जिन की सीमा लागू होने के बाद बाजार में कैंसर की गैर-अनुसूचित दवाओं की वास्तविक खुदरा कीमतों में कितनी कमी आती है और इसका फायदा मरीजों तक किस स्तर तक पहुंचता है।


