कोरबा 8 अक्टूबर 2026। कोरबा में एसईसीएल की कुसमुंडा परियोजना के विस्तार और भू-विस्थापितों के पुनर्वास को लेकर अब सियासी पारा चढ़ गया है। उद्योग मंत्री एवं कोरबा विधायक लखनलाल देवांगन ने एसईसीएल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि भूमि अधिग्रहण के बाद प्रभावित परिवारों को समय पर बसाहट, मुआवजा और रोजगार देने में प्रबंधन की ओर से अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है। मंत्री की नाराजगी ऐसे समय सामने आई है, जब कुसमुंडा परियोजना के विस्तार के लिए चंद्रनगर-जटराज के प्रभावित परिवारों ने बिना पूरी वैकल्पिक बसाहट के मकान खाली कराने का दबाव बनाए जाने का आरोप लगाया है।
कोरबा प्रवास के दौरान मीडिया से बातचीत में मंत्री लखनलाल देवांगन ने एसईसीएल की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि….‘एसईसीएल का रवैय्या ही थोड़ा खराब है। क्योंकि एसईसीएल पूर्ण रूप से जमीन को अधिग्रहण करती है, न तो सहीं ढंग से बसाहट की व्यवस्था करती है, न सहीं ढंग से नौकरी की व्यवस्था करती है। जटराज का भी अभी बसाहट का पूरा व्यवस्था नहीं हुआ है और ग्रामीणों के घर तोड़े जा रहे है। ये सहीं नहीं है, रही बात एसईसीएल के रवैय्या की तो हमेशा ही खराब रहता है, उसे सुधार करना चाहिए।” शासन-प्रशासन के निर्देशों के बावजूद की जा रही की जा रही मनमानी पर मंत्री देवांगन ने कह दिया कि….“शासन-प्रशासन हमेशा ही एसईसीएल पर उचित मुआवजा, नौकरी और विस्थापन के लिए दबाव बनाता है।
लेकिन एसईसीएल प्रबंधन ही हमेशा गुमराह करने का प्रयास किया जाता है। जटराज का उदाहरण देते हुए मंत्री ने कहा कि….“अभी बसाहट की पूरी व्यवस्था नहीं हुई है और इसके बावजूद ग्रामीणों के मकान तोड़े जा रहे हैं। उन्होंने इसे सही प्रक्रिया नहीं बताया और एसईसीएल प्रबंधन को अपना रवैया सुधारने की नसीहत दी।
सबसे बड़ा सवाल- जब बसाहट पूरी नहीं तो मकान क्यों खाली करा रहे ?
जटराज का विवाद अब इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूम रहा है। प्रभावित परिवारों का कहना है कि प्रस्तावित बसाहट स्थल पर सड़क, बिजली, पानी समेत कई मूलभूत सुविधाएं अभी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि इसके बावजूद मकान खाली करने का दबाव बनाया जा रहा है। खास बात यह है कि जून 2025 में कोरबा कलेक्टर ने जटराज के पुनर्वास स्थल का निरीक्षण करते हुए निर्देश दिया था कि जब तक पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना स्थल तैयार न हो जाए, तब तक विस्थापन की कार्रवाई शुरू न की जाए। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उस प्रशासनिक निर्देश का पूरी तरह पालन हुआ ? अगर नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी है ?
मंत्री बोले- जनप्रतिनिधियों की बात पर हामी, बाद में रवैया ढीला
उद्योग मंत्री ने एसईसीएल के साथ बैठकों के अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि जब जनप्रतिनिधि और अधिकारी प्रबंधन से चर्चा करते हैं तो उनकी बातों पर सहमति जताई जाती है, लेकिन बाद में संबंधित कामों को लेकर एसईसीएल का रवैया ढीला पड़ जाता है। यानी मंत्री के आरोपों का केंद्र केवल जटराज का मामला नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों और एसईसीएल प्रबंधन के बीच समन्वय और निर्देशों के पालन का सवाल भी है। मंत्री देवांगन ने कहा कि….”शासन और प्रशासन की ओर से लगातार एसईसीएल पर उचित मुआवजा, रोजगार और विस्थापितों की व्यवस्थित बसाहट के लिए दबाव बनाया जाता है। इसके बावजूद अगर प्रभावित परिवारों को उन्हीं समस्याओं से गुजरना पड़े, तो सवाल एसईसीएल की कार्यप्रणाली पर ही उठेगा।”
मंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि एसईसीएल को अपने रवैये में सुधार करना चाहिए और भारत सरकार के नियमों के तहत काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों के स्तर पर होने वाली लापरवाही से समस्याएं पैदा होती हैं और प्रबंधन को इस अव्यवस्था को समय रहते सुधारना चाहिए। कोरबा में एसईसीएल की परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों की मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास की मांग लंबे समय से उठती रही है। कुसमुंडा क्षेत्र के ग्रामीण पहले भी इन मुद्दों को लेकर आंदोलन कर चुके हैं। एसईसीएल की कार्यप्रणाली पर मंत्री लखनलाल देवांगन की सार्वजनिक नाराजगी को प्रशासन और प्रबंधन के लिए स्पष्ट संदेश के तौर पर देखा जा सकता है।
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यहीं है कि…..क्या मंत्री की फटकार के बाद जटराज के प्रभावित परिवारों को पहले पूरी बसाहट मिलेगी और उसके बाद ही मकान हटाने की कार्रवाई होगी ? क्या एसईसीएल लंबित मुआवजा और रोजगार के मामलों की समयबद्ध समीक्षा करेगा ? और क्या जनप्रतिनिधियों के निर्देशों पर अब सिर्फ हामी नहीं, बल्कि जमीन पर कार्रवाई भी दिखाई देगी ? कुसमुंडा परियोजना का विस्तार कोयला उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन उसके साथ जुड़े भू-विस्थापन और पुनर्वास के सवालों का समाधान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। फिलहाल मंत्री की नाराजगी ने एसईसीएल प्रबंधन की कार्यप्रणाली को लेकर बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है।


