रायपुर 22 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों आरोप-प्रत्यारोप के साथ खुली चुनौती और उसे स्वीकार करने की राजनीति भी तेजी से चर्चा में है। प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा की सार्वजनिक बहस के बाद अब यही सियासी अंदाज स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुंच गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पर खुली चुनौती दी है। मंत्री ने भी चुनौती स्वीकार करते हुए कहा है कि अस्पताल का चयन बैज कर लें, वह साथ चलने को तैयार हैं।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में एक तरफ आम जनता जर्जर सड़क, बदहाल शिक्षा और स्वास्थ सुविधा से जूझ रही है। वहीं दूसरी पक्ष और विपक्ष इन दिनों आरोप-प्रत्यारोप के साथ ही एक दूसरे को खुली चुनौती देने में जुटे हुए है। पहले पूर्व सीएम भूपेश बघेल और अब पीसीसी चीफ दीपक बैज ने सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाते हुए स्वास्थ्य मंत्री को चुनौती दे दी है। उन्होने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री उनके साथ प्रदेश के किसी भी सरकारी अस्पताल में चलें और मौके पर स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति देखें। बैज का तर्क है कि अस्पतालों की वास्तविक स्थिति का आकलन सिर्फ सरकारी दावों या बैठकों से नहीं, बल्कि मौके पर पहुंचकर किया जाना चाहिए।
इसी चुनौती के जवाब में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने भी साथ अस्पताल चलने की सहमति जताई है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने बैज की चुनौती स्वीकार करते हुए अस्पताल के चयन का जिम्मा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पर छोड़ दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक मंत्री ने रायपुर से लेकर बस्तर तक किसी भी अस्पताल में साथ जाने की बात कही है। हालांकि दोनों नेताओं के संयुक्त अस्पताल दौरे की तारीख और स्थान अभी तय नहीं हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम को छत्तीसगढ़ की मौजूदा ‘चैलेंज पॉलिटिक्स’ की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।
इससे पहले 15 सितंबर को रायपुर प्रेस क्लब में प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के बीच सार्वजनिक बहस हुई थी। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 80 मिनट चली इस बहस में दोनों नेताओं ने योजना से जुड़े आंकड़ों और अपने-अपने दावों को लेकर पक्ष रखा था। इसके बाद भूपेश बघेल ने हसदेव और तारा कोल ब्लॉक के मुद्दे पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को खुली बहस की चुनौती दी थी। अब दीपक बैज और श्याम बिहारी जायसवाल के बीच अस्पतालों की व्यवस्था को लेकर चुनौती सामने आने से यह राजनीतिक शैली फिर चर्चा में है।
सवाल सिर्फ चुनौती का नहीं, नतीजे का भी है
राजनीतिक बहस और सार्वजनिक चुनौती लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा हो सकती है। इससे सत्ता पक्ष और विपक्ष को अपने-अपने दावों को सार्वजनिक रूप से रखने का अवसर मिलता है। लेकिन इस तरह की चुनौती का महत्व तभी बढ़ता है, जब बयानबाजी से आगे बढ़कर तथ्य, आंकड़े और जमीनी स्थिति भी सार्वजनिक हों। स्वास्थ्य व्यवस्था के मामले में अस्पताल का दौरा होने पर सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय डॉक्टरों की उपलब्धता, दवाओं की स्थिति, जांच सुविधाएं, मरीजों का दबाव, स्टाफ की उपलब्धता और आधारभूत सुविधाओं जैसे ठोस बिंदुओं पर तस्वीर सामने आ सकती है।
क्या ‘चैलेंज पॉलिटिक्स’ बनेगी नई सियासी परंपरा ?
छत्तीसगढ़ में हाल के दिनों में नेताओं के बीच सार्वजनिक बहस और चुनौती का सिलसिला लगातार दिखाई दे रहा है। पहले आवास योजना, फिर हसदेव-तारा कोल ब्लॉक और अब स्वास्थ्य व्यवस्था—मुद्दे अलग हैं, लेकिन राजनीतिक संवाद का तरीका लगभग एक जैसा है। अब बड़ा सवाल यह है कि बैज और जायसवाल की चुनौती सिर्फ राजनीतिक बयान तक सीमित रहती है या दोनों वास्तव में किसी सरकारी अस्पताल में आमने-सामने पहुंचकर स्वास्थ्य व्यवस्था की पड़ताल करते हैं। यदि ऐसा होता है तो चर्चा का केंद्र केवल ‘किसने किसे चुनौती दी’ नहीं रहेगा, बल्कि अस्पताल में मौजूद वास्तविक सुविधाओं और सरकार-विपक्ष के दावों के बीच कितना अंतर है, यह भी सामने आ सकता है। फिलहाल दोनों पक्षों की ओर से चुनौती और स्वीकार किए जाने की बात सामने आ चुकी है, जबकि स्थान और तारीख तय होना बाकी है।


