रायपुर 11 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ की राजनीति में शुक्रवार को एक ऐसा सियासी घटनाक्रम हुआ, जिसने परिवार से लेकर समाज और आगामी विधानसभा चुनाव के संभावित समीकरणों तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सतनामी समाज के धर्मगुरु गुरु बालदास के बड़े बेटे ढाल दास ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है। खास बात यह है कि उनके छोटे भाई खुशवंत साहेब भाजपा सरकार में मंत्री हैं।रायपुर में कांग्रेस के तीजा-पोरा कार्यक्रम के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ढाल दास को कांग्रेस की सदस्यता दिलाई। ढाल दास ने पार्टी में शामिल होते ही मुंगेली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा भी जाहिर कर दी।
ढाल दास की कांग्रेस में एंट्री का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू यही है कि एक ही परिवार के दो प्रमुख चेहरे अब अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ छोटे भाई खुशवंत साहेब भाजपा सरकार में मंत्री हैं, वहीं बड़े भाई ढाल दास ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। इससे स्वाभाविक तौर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में सतनामी समाज के भीतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नए समीकरण बन सकते हैं ? हालांकि ढाल दास के कांग्रेस में शामिल होने को सीधे तौर पर परिवार या समाज के राजनीतिक रुख में बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस ने इस घटनाक्रम के जरिए सतनामी समाज के बीच अपना राजनीतिक संदेश मजबूत करने का मौका हासिल किया है।
मुंगेली से चुनाव लड़ने की इच्छा ने बढ़ाई चर्चा
कांग्रेस में शामिल होने के बाद ढाल दास ने साफ कहा कि अगर पार्टी उन्हें मौका देती है तो वह मुंगेली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी जहां से चुनाव लड़ने के लिए चयन करेगी, वे वहां से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं। यही बयान इस पूरे घटनाक्रम को महज राजनीतिक सदस्यता तक सीमित नहीं रहने देता। मुंगेली से चुनाव लड़ने की इच्छा ने इसे संभावित चुनावी तैयारी से जोड़ दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में कांग्रेस संगठन ढाल दास को किस भूमिका में रखता है और क्या उन्हें मुंगेली में सक्रिय किया जाता है, यह देखना अहम होगा।
ढाल दास ने यह भी कहा कि कांग्रेस में शामिल होने का फैसला लेने से पहले उन्होंने अपने पिता गुरु बालदास और भाई खुशवंत साहेब से बातचीत की थी। उनके मुताबिक, दोनों को उन्होंने अपने फैसले की जानकारी दी और दोनों ने सहमति दी। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद यह मामला केवल राजनीतिक दल बदलने का नहीं रह जाता, बल्कि परिवार के भीतर अलग-अलग राजनीतिक भूमिकाओं का भी उदाहरण बनता है।
खुशवंत साहेब का पलटवार—‘कांग्रेस तोड़ने की नीति से काम करती है’
दूसरी ओर मंत्री खुशवंत साहेब ने अपने भाई के कांग्रेस में जाने पर कांग्रेस पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा तोड़ने की नीति से काम करती है। यानी ढाल दास की कांग्रेस में एंट्री के साथ ही भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाने की संभावना है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में सतनामी समाज का महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव माना जाता है।
ऐसे में गुरु बालदास के परिवार से जुड़े एक प्रमुख चेहरे का कांग्रेस में जाना कांग्रेस के लिए प्रतीकात्मक और राजनीतिक, दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकता है। खासकर तब, जब ढाल दास खुद चुनावी राजनीति में उतरने की इच्छा जता चुके हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि इस एंट्री को संगठनात्मक ताकत और चुनावी समर्थन में कितना बदला जा सकता है। वहीं भाजपा के सामने भी यह सवाल रहेगा कि मंत्री खुशवंत साहेब के प्रभाव और सतनामी समाज में पार्टी की पकड़ को किस तरह और मजबूत किया जाए।
भूपेश बघेल के मंच से एंट्री, संदेश कितना बड़ा ?
ढाल दास को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा कांग्रेस में शामिल कराया जाना भी अपने आप में राजनीतिक संदेश रखता है। कांग्रेस इसे निश्चित तौर पर भाजपा सरकार के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करने के मौके के तौर पर इस्तेमाल करेगी। दूसरी ओर भाजपा इसे परिवार और समाज के भीतर राजनीतिक विभाजन के रूप में देखने के बजाय अपने मंत्री की राजनीतिक पकड़ के जरिए जवाब देने की कोशिश कर सकती है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ढाल दास की कांग्रेस एंट्री सिर्फ संगठन में शामिल होने तक सीमित रहेगी या पार्टी उन्हें मुंगेली की चुनावी राजनीति में सक्रिय चेहरा बनाएगी?
अगर कांग्रेस उन्हें मुंगेली से मैदान में उतारने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो यह मुकाबला केवल एक विधानसभा सीट की लड़ाई नहीं रहेगा। गुरु बालदास के परिवार के दो राजनीतिक चेहरों के अलग-अलग खेमों में खड़े होने से यह मुकाबला सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बन सकता है। यही वजह है कि ढाल दास की कांग्रेस में एंट्री को फिलहाल एक सदस्यता से ज्यादा, छत्तीसगढ़ की आने वाली चुनावी राजनीति के संभावित नए समीकरण के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।


