गरियाबंद 7 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का बड़ा अंतर सामने आया है। मैनपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत साल्हेभांटा में बनवापारा और खासरपारा के बीच स्थित एक बरसाती नाला स्कूली बच्चों के लिए हर साल जानलेवा चुनौती बन जाता है। बारिश के मौसम में बच्चे इसी उफनते नाले को पार कर स्कूल पहुंचने को मजबूर हैं, जबकि ग्रामीण वर्षों से यहां पुलिया निर्माण की मांग कर रहे हैं। बारिश के दौरान नाले का जलस्तर बढ़ने पर स्थिति और गंभीर हो जाती है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में लगातार हो रही बारिश से नदी-नाले उफान पर है। और इसी उफान भरे नदी-नालों में जान जोखिम में डालकर शिक्षक और छात्र स्कूल पहुंच रहे है। छत्तीसगढ़ के बस्तर सहित कई जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों से ऐसी तस्वीर लगातार सामने आ रही है, जहां पुल-पुलियां नहीं बनने के कारण सालों से जान जोखिम में डालकर स्कूल तक का सफर तय करते है। कुछ ऐसी ही तस्वीर इस बार गरियाबंद जिले से साामने आयी है। यहां के मैनपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत साल्हेभांटा में बनवापारा और खासरपारा के बीच बरसाती नाला स्कूली बच्चों के लिए मुसीबत बना हुआ है।
आलम ये है कि मानसून की दस्तक के साथ ही इस क्षेत्र के स्कूली छात्र और परिजनों की चिंता बढ़ जाती है। नाले पर पुल नहीं बनने के कारण छात्र आज भी उफनते नाले का पार कर स्कूल पहुंचते है। ग्रामीणों की माने तो प्रधानमंत्री जन मन योजना के तहत गांव तक पक्की सड़क का निर्माण तो कर दिया गया। लेकिन जिस बरसाती नाले पर पुलिया की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वहां अब तक निर्माण नहीं हो सका। सड़क बनने के बावजूद पुल नहीं होने से पूरी परियोजना का उद्देश्य अधूरा नजर आता है। ग्रामीणों का कहना है कि इस समस्या की जानकारी कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को दी गई, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला।
उनका कहना है कि हर साल बारिश के मौसम में यही स्थिति बनती है और हर बार किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। भारी बारिश में जब नाले का पानी उफान पर होता है, तब कई बार बच्चों को अकेले नाला पार करना संभव नहीं होता। ऐसे में माता-पिता उन्हें हाथ पकड़कर या गोद में उठाकर दूसरी ओर पहुंचाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मानसून के करीब तीन महीने तक बच्चों की पढ़ाई इसी जोखिम के बीच जारी रहती है। यह मामला केवल एक पुलिया के निर्माण का नहीं, बल्कि ग्रामीण बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा तक सुरक्षित पहुंच के अधिकार से भी जुड़ा है।
एक ओर सरकार शिक्षा को बढ़ावा देने और दूरस्थ क्षेत्रों तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर बच्चे स्कूल जाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यहीं कि क्या इस समस्या का समाधान किसी बड़े हादसे के बाद होगा ? या फिर प्रशासन समय रहते पुलिया निर्माण कर बच्चों के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराएगा ? फिलहाल साल्हेभांटा के ग्रामीणों का इंतजार जारी है और उनकी निगाहें शासन-प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।

