रायपुर, 7 अगस्त 2026। राजधानी रायपुर से रिश्तों को शर्मसार कर देने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। कारोबार में साझेदारी और दोगुना मुनाफा दिलाने का झांसा देकर एक शातिर भाई ने अपनी ही बहन और जीजा से करीब 1.25 करोड़ रुपये की कथित ठगी कर ली। इतना ही नहीं, आरोप है कि फर्जी हस्ताक्षर कर दोनों को साझेदारी फर्म से बाहर भी दिखा दिया गया। मामले में शिकायत मिलने के बाद तेलीबांधा थाना पुलिस ने धोखाधड़ी, कूटरचना और जालसाजी समेत विभिन्न धाराओं में अपराध दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
पुलिस के मुताबिक नागपुर के लॉ कॉलेज स्क्वायर निवासी शिवांगी गर्ग, जो पेशे से मनोवैज्ञानिक काउंसलर हैं। उन्होने अपने भाई शुभम सिंघल और भाभी जया सिंघल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। आरोप है कि दोनों रायपुर में अधिराज सीमेंट और बाद में अधिराज ट्रेडलिंक के नाम से साझेदारी फर्म संचालित करते हैं। शिकायत के अनुसार, वर्ष 2020 में कारोबार का विस्तार करने और अधिक मुनाफा दिलाने का भरोसा देकर शुभम और जया ने शिवांगी और उनके पति से अलग-अलग समय पर नगद और बैंकिंग माध्यम से करीब 1.25 करोड़ रुपये का निवेश कराया।
शुरुआती दिनों में भरोसा कायम रखने के लिए लाभांश भी दिया जाता रहा, लेकिन बाद में भुगतान बंद कर दिया गया। पीड़िता का आरोप है कि जब उन्होंने अपनी निवेश राशि वापस मांगी, तो 4 अप्रैल 2025 को उन्हें दोनों फर्मों में भागीदार बना दिया गया। इसके बाद भी रकम नहीं लौटाई गई। जनवरी 2026 में पारिवारिक बैठक के दौरान पैसे लौटाने का आश्वासन दिया गया, लेकिन वादा पूरा नहीं हुआ। मामले ने तब नया मोड़ लिया जब शिवांगी गर्ग ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत रजिस्ट्रार ऑफ फर्म्स से दस्तावेज मंगाए।दस्तावेजों की जांच में कथित तौर पर खुलासा हुआ कि 6 मार्च और 6 अप्रैल 2026 की पार्टनरशिप डीड में उनके फर्जी हस्ताक्षर कर उन्हें दोनों फर्मों से सेवानिवृत्त दिखा दिया गया।
शिवांगी का दावा है कि उन दोनों तारीखों पर वह रायपुर में मौजूद ही नहीं थीं। शिकायत के आधार पर तेलीबांधा थाना पुलिस ने आरोपी शुभम सिंघल और जया सिंघल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 336(3), 338 और 340(2) के तहत मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस अब बैंकिंग लेन-देन, साझेदारी से जुड़े दस्तावेजों और कथित फर्जी हस्ताक्षरों की जांच कर रही है। यह मामला केवल आर्थिक अपराध का नहीं, बल्कि रिश्तों में भरोसे के टूटने का भी है। अब जांच से यह साफ होगा कि निवेश की रकम का इस्तेमाल किस तरह किया गया और कथित फर्जी दस्तावेज तैयार करने में किन-किन लोगों की भूमिका रही।

