रायपुर 16 जून 2025। छत्तीसगढ़ में गर्मी की छुट्टियों के बाद आज मंगलवार को प्रदेशभर की पाठशालाओं के पट तो खुल गए, लेकिन सरकारी शिक्षा व्यवस्था की हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में खड़ी नजर आ रही है। नई कक्षाओं, नए पाठ्यक्रम और नए सपनों के साथ स्कूल पहुंचे लाखों बच्चों का स्वागत कई जगहों पर शिक्षकों की भारी कमी ने किया। हालत यह है कि छत्तीसगढ़ के 1800 से अधिक प्राथमिक विद्यालय आज भी केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं। ऐसे में एक ही शिक्षक को पांच कक्षाओं की पढ़ाई से लेकर प्रशासनिक कार्यों तक की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। शिक्षा विभाग भले ही गुणवत्ता शिक्षा, नई शिक्षा नीति और शैक्षणिक सुधारों के बड़े-बड़े दावे कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है।
गौरतलब है कि प्रदेश में सहायक शिक्षकों, शिक्षकों और व्याख्याताओं के हजारों पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। जबकि भर्ती प्रक्रिया अब भी सुस्त रफ्तार से आगे बढ़ रही है। सबसे अधिक प्रभावित दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्र हैं, जहां बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं हैं, तो आखिर शिक्षा क्रांति के दावों की नींव किस आधार पर रखी जा रही है ? शिक्षा विभाग के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 31 जनवरी 2026 तक राज्य में सहायक शिक्षकों के 28 हजार से अधिक पद रिक्त हैं। इसके अलावा शिक्षकों और व्याख्याताओं के हजारों पद खाली पड़े हैं। सवाल यह है कि जब विभाग को वर्षों से इस संकट की जानकारी थी, तब ग्रीष्मकालीन अवकाश और अन्य उपलब्ध समय का उपयोग भर्ती प्रक्रिया पूरी करने में क्यों नहीं किया गया ?
सबसे चिंताजनक स्थिति बस्तर संभाग में है, जहां सहायक शिक्षकों के 28 हजार से अधिक, शिक्षकों के 8 हजार 473 और व्याख्याताओं के 8 हजार 316 पद रिक्त हैं। बीजापुर, बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा और बलरामपुर जैसे जिलों में सैकड़ों स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में यह कल्पना करना मुश्किल नहीं कि एक ही शिक्षक पांच कक्षाओं के बच्चों को किस तरह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे पाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और शिक्षा का अधिकार कानून शिक्षक-छात्र अनुपात को स्पष्ट रूप से निर्धारित करते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई स्कूलों में बच्चों को नियमित विषयवार पढ़ाई तक उपलब्ध नहीं हो पा रही। कहीं शिक्षक प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त हैं तो कहीं एक ही शिक्षक को प्रधान पाठक, क्लर्क और अध्यापक की भूमिका निभानी पड़ रही है।
शिक्षा मंत्री द्वारा 50 हजार भर्तियों का दावा किया गया था, लेकिन यह प्रक्रिया अब तक अधूरी है। बाद में 5 हजार शिक्षकों की भर्ती की घोषणा हुई, जिसमें भी केवल 2292 सहायक शिक्षक पदों के लिए परीक्षा आयोजित की गई। भर्ती की यह धीमी रफ्तार बताती है कि सरकार और विभाग शिक्षा संकट की गंभीरता को अभी भी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षक की कमी केवल रोजगार का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक विकास का प्रश्न है। जिन बच्चों को आज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलेगी, वे कल प्रतिस्पर्धा की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। इसका असर पूरे प्रदेश की मानव संसाधन क्षमता पर पड़ेगा।
शिक्षा विभाग के सामने बड़े सवाल
जब हजारों पद वर्षों से खाली थे तो समय पर भर्ती क्यों नहीं हुई ? ग्रीष्मकालीन अवकाश का उपयोग नियुक्तियों और पदस्थापन में क्यों नहीं किया गया ? राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मानकों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है ? एक शिक्षक वाले स्कूलों में बच्चों की सीखने की गुणवत्ता का आकलन कौन करेगा? प्रदेश में शिक्षा सुधार की बातें अक्सर होती हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जमीनी स्तर पर स्थिति अब भी गंभीर है। यदि जल्द व्यापक भर्ती, पारदर्शी पदस्थापना और संसाधनों का संतुलित वितरण नहीं किया गया तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन हजारों बच्चों को होगा, जिनके सपनों की नींव सरकारी स्कूलों में रखी जा रही है। शिक्षा केवल भवनों और योजनाओं से नहीं चलती, बल्कि शिक्षकों से चलती है। जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो नई शिक्षा नीति और गुणवत्ता शिक्षा के दावे कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे।
