कोरबा 17 जुलाई 2026। कोरबा के दादर में पांच साल के मासूम प्रकाश पटेल की आवारा कुत्तों के हमले में हुई मौत सिर्फ एक दर्दनाक हादसा नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल है, जो हर त्रासदी के बाद सक्रिय तो दिखती है, लेकिन उससे पहले खामोश रहती है। घटना के बाद नगर निगम ने पीड़ित परिवार को एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है और आवारा कुत्तों की धरपकड़ व नसबंदी अभियान तेज करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन सबसे अहम सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई घटना से पहले नहीं हो सकती थी ?
गुरुवार शाम दादर में मजदूरी करने वाले किशोर पटेल का पांच वर्षीय बेटा प्रकाश अपने पिता से मिलकर घर लौट रहा था। रास्ते में आवारा कुत्तों के झुंड ने उस पर हमला कर दिया। मासूम को इतनी बेरहमी से नोचा गया कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी जिंदगी खत्म हो गई। ये हादसा एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की असफलता है, जो शहर में आवारा कुत्तों की समस्या से वर्षों से परिचित होने के बावजूद प्रभावी समाधान नहीं निकाल सकी। घटना के बाद नगर निगम आयुक्त आशुतोष पांडेय पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। उन्होंने संवेदना जताई, आर्थिक सहायता देने की घोषणा की और अधिकारियों को दोबारा आवारा कुत्तों की धरपकड़ व नसबंदी अभियान तेज करने के निर्देश दिए।
यह कदम मानवीय दृष्टि से स्वागतयोग्य है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि अभियान अब चल सकता है, तो पहले क्यों नहीं चला ? कोरबा में आवारा कुत्तों की समस्या कोई नई नहीं है। शहर की कई कॉलोनियों, बस्तियों और सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों के झुंड खुलेआम घूमते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और राहगीरों पर हमले की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। इसके बावजूद यदि प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी सवाल है। हर बड़ी घटना के बाद अधिकारियों की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। बैठकें होती हैं, निर्देश जारी होते हैं, अभियान शुरू होते हैं और कुछ दिन बाद सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
इस चक्र को तोड़ना ही सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि किसी भी प्रशासन की सफलता का पैमाना हादसे के बाद की कार्रवाई नहीं, बल्कि हादसे को रोकने की क्षमता होती है। कोरबा नगर निगम को आज जरूरत सिर्फ मुआवजा देने की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि आखिर इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन है ? क्या शहर में आवारा कुत्तों की संख्या का नियमित सर्वे हुआ ? क्या पहले मिली शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई की गई ? यदि इन सवालों के जवाब ‘नहीं’ हैं, तो फिर केवल आर्थिक सहायता देकर जिम्मेदारी पूरी नहीं मानी जा सकती। प्रकाश पटेल अब कभी वापस नहीं आएगा। उसके माता-पिता के लिए एक लाख रुपये उस दर्द की भरपाई नहीं कर सकते, जिसे उन्हें जीवनभर झेलना होगा। यह घटना प्रशासन के लिए चेतावनी है कि जन सुरक्षा केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए।

