दुर्ग19 जुलाई 2026। भिलाई के सेक्टर-9 स्थित जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा एवं अनुसंधान केंद्र के प्रस्तावित निजीकरण का विरोध शुरू हो गया है। पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव ने इस प्रस्तावित निजीकरण का विरोध करते हुए राज्य सरकार पर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक अस्पताल के निजीकरण का मामला नहीं, बल्कि प्रदेश की स्वास्थ्य नीति और आम लोगों के इलाज के अधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस.सिंहदेव का ये बयान दुर्ग में मीडिया से चर्चा के दौरान सामने आया। सिंहदेव ने कहा कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को निजी हाथों में सौंपने से सबसे अधिक असर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों पर पड़ेगा, जो आज भी सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं। सिंहदेव ने कहा कि सेक्टर-9 अस्पताल की स्थापना लोगों को बेहतर और कम लागत वाली स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। ऐसे अस्पताल का निजीकरण उसके मूल उद्देश्य के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि यदि सरकारी भवन, चिकित्सा उपकरण और सार्वजनिक संसाधन निजी संस्थाओं को सौंप दिए जाते हैं और बदले में मरीजों से शुल्क लिया जाता है, तो इससे आम लोगों के इलाज का खर्च बढ़ेगा। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रहे सिंहदेव ने यूनिवर्सल हेल्थ केयर की अवधारणा का जिक्र करते हुए कहा कि आदर्श स्वास्थ्य व्यवस्था वही है, जहां किसी भी मरीज को दवा, जांच, भर्ती और इलाज के लिए अपनी जेब से खर्च न करना पड़े।
उन्होंने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि हर नागरिक को सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराए, न कि सार्वजनिक संस्थानों का दायरा कम करे। सिंहदेव ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार एक-एक कर सरकारी संस्थानों के निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ रही है। उनके मुताबिक इससे यह संदेश जाता है कि सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी ढंग से संचालित करने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रही है।
प्रदेश में फिर तेज हुई स्वास्थ्य सेवाओं पर बहस
भिलाई के सेक्टर-9 अस्पताल के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा को लेकर बहस तेज हो गई है। विपक्ष इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर करने वाला कदम बता रहा है, जबकि सरकार की ओर से इस मुद्दे पर अब तक कोई बयान सामने नहीं आया है। फिलहाल, सेक्टर-9 अस्पताल का मुद्दा केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ में भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था सरकारी मॉडल पर आधारित होगी या निजी भागीदारी की ओर बढ़ेगी।

